शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)-28
(Desi Kahani) 9
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कविता सिसकने लगी.. “कुछ कीजिए ना भाभी.. मुझे अंदर जोर की खुजली मची है.. वो किचन में मूसल पड़ा है वही डाल दीजिए”
शीला: “अरे पागल.. उस मूसल से मैंने सुबह ही लहसुन कुटा था.. गलती से भी चुत को छु गया तो नीचे आग लग जाएगी.. ” शीला ने झुककर कविता की चुत की एक चुम्मी ले ली.. और अपनी जीभ को क्लिटोरिस पर रगड़ दिया.. साथ ही साथ अपनी उँगलियाँ अंदर डालने लगी
कविता: “उईईई माँ.. डाल दी तीनों उँगलियाँ अंदर?”
शीला: “नही.. अभी केवल दो उँगलियाँ ही गई है अंदर.. ” शीला ने कविता की नारंगी दबा दी
“तीन तो अंदर नहीं ले पाऊँगी.. जल रहा है अंदर”
“तो फिर रसिक का लंड देखने की जिद ही छोड़ दे.. क्यों की उसका लंड एक बार देख लिया तो उससे बिना चुदे रह नहीं पाएगी.. और अगर चुदवाने की कोशिश भी की.. तो दर्जी से सिलवाने पड़ेगी तेरी.. ”
“ओह्ह भाभी.. प्लीज.. मुझे एक बार.. बस एक बार देखना है.. आप बुलाइए ना रसिक को.. प्लीज प्लीज प्लीज भाभी”
शीला के मुंह से रसिक के लंड का विवरण सुनकर पिघल गई थी कविता.. उसने भाभी को पटाने के लिए उनके भोसड़े में अपनी उँगलियाँ घोंप दी..
“आह्ह.. कविता.. !!”
“प्लीज भाभी.. मुझे रसिक का एक बार देखना है.. कुछ करो न प्लीज” कविता गिड़गिड़ाने लगी
शीला के भोसड़े से रस का झरना बहने लगा.. “ओह कविता.. तू अभी मुझे उसकी याद मत दिला यार.. ” कविता की उंगलियों पर अपने भोसड़े को ऊपर नीचे करते हुए शीला ने कहा.. कविता शीला के उत्तुंग शिखरों जैसे स्तनों को चूमने लगी.. दोनों के बीच उम्र का काफी अंतर था पर उसके बावजूद एक ऐसा संबंध स्थापित हो चुका था जो बड़ा ही अनोखा था।
कविता को इस बात से ताज्जुब हो रहा था की जो उत्तेजना उसे शीला भाभी के जिस्म से खेलने पर प्राप्त होती है.. वैसा उसे पीयूष के साथ कभी महसूस नहीं हुआ था.. पता नहीं ऐसा कौनसा जादू था शीला भाभी में?
शीला ने अब कविता की टांगें चौड़ी कर दी… उसने अपनी उंगलियों से गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों को सहलाया और उसकी गुलाबी क्लिटोरिस को दो उँगलीयों के बीच दबा दिया
“उईई.. आह्ह.. मर गई.. ” शीला ने अब चाटना भी शुरू कर दिया “आह्ह भाभी.. इस तरह तो कभी पीयूष भी नहीं चाटता मेरी.. ” कविता की कचौड़ी जैसी फुली हुई चुत की दोनों फाँकों को बारी बारी चाट रही थी शीला.. साथ ही साथ वह कविता के अमरूद जैसे स्तनों को मसलती जा रही थी..
एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए दोनों दो बार स्खलित हो गए.. थोड़ी देर वैसी ही अवस्था में पड़े रहने के बाद कविता शीला के पास आई और उन्हे बाहों में जकड़कर लिपट पड़ी.. बड़े ही प्रेम से उनके होंठों पर गरमागरम चुंबन करते हुए बोली
“शुक्रिया भाभी.. आपके पास आकर जिंदगी के सारे गम भूल जाती हूँ मैं.. आपसे मिलकर ही मुझे पता चला की असली मज़ा किसे कहते है.. और हाँ भाभी.. हम शनिवार को रेणुका भाभी के साथ डिनर पर जाने वाले है.. कंपनी का गेट-टूगेथर है.. उनके पति राजेश जी की कंपनी में पीयूष की नौकरी जो पक्की हो गई है”
“अरे वाह.. ये तो बहोत बड़ी खुशखबरी है.. कविता.. !! देखा.. पीयूष बेकार ही टेंशन कर रहा था.. काबिल और महेनती लोगों को काम मिल ही जाता है.. ”
“अब मैं चलूँ भाभी? रात का खाना बनाना है”
“हाँ ठीक है.. मैं भी सोच रही थी मार्केट हो आऊँ.. काफी दिन हो गए है बाजार गए.. कुछ चीजें लानी है”
कविता के जाने के बाद शीला मार्केट से जरूरी सामान ले आई और अपने अस्त व्यस्त घर को ठीक करने में लग गई
शनिवार को शाम ७ बजे, कविता और पीयूष तैयार होकर होटल मनमंदिर पर जाने के लिए निकले.. अच्छी नौकरी मिलने से पीयूष खुश था.. कविता किसी अलग कारण से उत्साहित थी.. समय का पाबंद पीयूष ७:४५ को होटल के प्रांगण में पहुँच गया..
“आओ पीयूष.. आइए भाभी जी” राजेश ने उन दोनों का स्वागत किया
पूरा कॉनफरन्स रूम भरा हुआ था.. कविता यहाँ किसी को नहीं जानती थी.. पीयूष को अभी तीन दिन ही हुए थे.. पर वो कुछ कुछ लोगों को जानता था.. इसलिए उनसे बातों में व्यस्त हो गया
कविता अकेले ही पूरे हॉल में घूमने लगी.. उसके दिमाग में एक ही बात चल रही थी “मेरा अंदाजा गलत नहीं हो सकता.. पिंटू की लिखाई को मैं बराबर जानती हूँ.. ऑफिस से आया हुआ वो खत पिंटू ने लिखा था इसका मुझे यकीन है.. ” उसकी आँखें यहाँ वहाँ एक ही इंसान को ढूंढ रही थी
“मे आई हेल्प यू?” पीछे से आवाज आई.. सुनकर कविता का रोम रोम पुलकित हो उठा। उसने पीछे मुड़कर देखा
“अरे पिंटू तू?? यहाँ.. ??” उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था
“कवि.. तू यहाँ कैसे?” पिंटू आश्चर्यचकित था..
“मेरे पति ने अभी अभी ये कंपनी जॉइन की है.. देख वो सामने खड़ा है.. पीयूष है उसका नाम”
“हाँ नाम तो मुझे पता था.. पर आज देखा पहली बार.. हेंडसम है तेरा पति.. और तू भी आज कितनी सेक्सी लग रही है यार.. आई लव यू जान” पिंटू ने कहा
शर्म से कविता की आँखें झुक गई.. उसके रूप और सौन्दर्य के सामने हॉल की सारी महिलायें फिक्की लग रही थी.. सब अपने अपने ग्रुप में मशरूफ़ थे इसलिए पिंटू की कही बात किसी के कानों पर नहीं पड़ी.. नहीं तो मुसीबत हो जाती
“हेंडसम तो तू भी बहोत लग रहा है आज.. मन तो ऐसा कर रहा है मेरा की अभी तुझे चूम लू.. कितने दिन हो गए.. साले तू कभी फोन या मेसेज क्यों नहीं करता?” कविता में छुपी प्रेमीका ने शिकायत की
“कवि.. ये सारी बातें यहाँ नहीं हो सकती.. मैं राजेश सर का पर्सनल सेक्रेटरी हूँ.. उनसे जुड़ी ऑफिस की सारी बातें मैं ही संभालता हूँ.. सुन कविता.. यहाँ हमे ऐसे ही बर्ताव करना है जैसे हम अनजान है.. नहीं तो किसी को शक हो जाएगा.. मैं अब चलता हूँ.. सर मुझे ढूंढ रहे होंगे”
उतने में पीयूष राजेश के साथ कविता के पास आया
“नमस्ते मैडम.. इस पूरे हॉल में सब से ज्यादा खूबसूरत आप लग रही हो.. इन सारे वेस्टर्न ड्रेस पहनी स्त्रीओं में आपकी साड़ी सब से अलग और आकर्षक लग रही है” राजेश ने कहा
पराए पुरुष से अपनी तारीफ सुनकर कविता शर्माने लगी.. ये सब उसे काफी नया नया लग रहा था। थोड़ी ही देर में सब डिनर टेबल पर बैठ गए और स्टेज पर माइक लिए खड़े पिंटू ने बोलना शुरू किया
“मेरे प्यारे मित्रों..
सारे उपस्थित स्टाफ और उनके परिवार का मैं दिल से स्वागत करता हूँ। मुझे ये बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है की हमारे परिवार में एक और कपल जुडने जा रहा है.. सब लोग तालियों के साथ स्वागत कीजिए.. मिस्टर पीयूष और मिसिस कविता.. !!”
अपने टेबल से खड़े होकर पीयूष और कविता ने सब का इस्तकबाल किया.. और वापिस चैर पर बैठ गए।
कविता का फिगर और खूबसूरती देखकर सब दंग रह गए.. सबके आकर्षण का केंद्र बन गई कविता !! उसके सेक्सी फिगर को लोग बार बार देख रहे थे.. कविता को थोड़ा सा विचित्र महसूस हो रहा था.. स्टेज पर से कंपनी के नए प्रोजेक्ट्स के बारे में जानकारी दी जा रही थी और सारा स्टाफ अब खाने में व्यस्त हो रहा था। कविता को खाने से ज्यादा पिंटू की आवाज सुनने में ज्यादा दिलचस्पी थी.. पिंटू यहाँ कैसे और कबसे नौकरी पर लगा होगा?? कविता तिरछी नज़रों से पिंटू को देख रही थी.. राजेश भी स्टेज पर बैठे बैठे पिंटू को सुन रहा था।
एकाध घंटे में खाना खतम हो गया.. सब एक के बाद एक जाने लगे.. जाने से पहले कविता एक बार और पिंटू से मिलना चाहती थी.. पर पीयूष के साथ होने के कारण ऐसा हो नहीं पाया.. अपनी पत्नी की इतनी तारीफ सुनने के बाद पीयूष थोड़ा सा असुरक्षित महसूस कर रहा था और इसलिए वो कविता का पल्लू छोड़ ही नहीं रहा था। वापिस लौटते वक्त पीयूष ने कंपनी के बारे में बहोत सारी बातें कही.. पर ना ही उसने पिंटू के बारे में जिक्र किया और ना ही कविता ने उसके बारे में कुछ पूछा..
दूसरे ही दिन से पीयूष नौकरी पर लग गया.. रोज रात को कविता पीयूष से कंपनी में हुई पूरे दिन की घटनाओं के बारे में पूछती.. इस आशा में की कहीं पिंटू की बात निकले पर उसे रोज निराश ही होना पड़ता था
एक सुबह ५ बजे कविता दूध लेने के लिए बाहर निकली तभी एक टैक्सी शीला भाभी के घर के आगे आकर रुकी.. करीब २७-२८ साल की लड़की सूट्कैस निकाल रही थी गाड़ी से.. और तभी रसिक दूधवाला भी आ पहुंचा
शीला ने दरवाजा खोला और वो लड़की अंदर चली गई.. रसिक से दूध लेकर शीला ने दरवाजा बंद कर दिया..
रसिक अब कविता के घर पर दूध देने पहुंचा.. दूध देते हुए उसने कहा
“उनकी बेटी आई है कलकत्ता से.. अच्छा है.. अब उनका अकेलापन दूर हो जाएगा”
कविता अंधेरे में नीचे देखकर रसिक के मोटे लंड का उभार ढूंढ रही थी..
कविता: “हाँ वो तो है रसिक.. अकेले रहना बड़ा मुश्किल होता है.. ” कविता को अपने साथ बात करता देख रसिक को आश्चर्य हुआ.. आज तक कभी भी उसने बात करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी..
रसिक के पजामे से उभार तो नजर आ रहा था जो उस मोटे लंड के होने का सबूत दे रहा था.. देखते ही कविता की पुच्ची में चुनचुनी होने लगी.. पर कहें कैसे रसिक को !! वह सोच में पड़ गई.. रसिक को आज शीला भाभी के साथ भी खेलना नसीब नहीं हुआ था.. वरना हररोज वो शीला के स्तनों को तो दबा ही लेता.. और अगर शीला हरी झंडी दिखाती.. तो उसका घाघरा उठाकर अपना एक किलो का लंड पेलकर धमाधम चोद भी लेता.. या तो फिर शीला उसका लंड हिलाकर उसके आँड़ों का मक्खन बाहर निकलवाने में मदद करती.. और फिर रसिक का पूरा दिन अच्छा जाता.. पर आज उनकी बेटी के आ जाने से कुछ भी नहीं हो पाया. अगर वह थोड़ी देर से आया होता तो शीला की बेटी अंदर चली गई होती और उसे कम से कम शीला के रसदार भारी स्तनों को दबाने का मौका तो मिलता..
रसिक ने कविता की नाजुक कमर और पतले शरीर को देखा.. और लगा की वह उसके किसी काम की नहीं थी.. रसिक के एक धक्के में ही उसका काम तमाम हो जाता.. कितनी संकरी होगी इसकी चुत ? रसिक देखते देखते सोच रहा था.. अगर इसके अंदर मेरा लोडा डालूँ तो ये लहू लुहान हो जाएगी.. अरे इसका तो पेशाब ही बंद हो जाएगा.. और मुझे ही उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ेगा !!
“क्या सोच रहे हो रसिक? दूध डालो पतीली में !!” रसिक की कामुक नजर.. सुबह का एकांत और अंधेरा.. शीला भाभी की बातों में सुने वर्णन के आधार पर रसिक के लंड की कल्पना करते हुए कविता पागल हो रही थी.. रसिक की चौड़ी छाती और पहलवान जैसा शरीर देखकर कविता की पेन्टी गीली होने लगी..
वो सोच रही थी “इतना बड़ा पहाड़ सा इंसान मेरे ऊपर चढ़ेगा तो मेरा क्या हश्र होगा !! बाप रे.. कम से कम १०० किलो वजन होगा इसका.. मेरे ऊपर तो पीयूष चढ़ता है तब भी मेरी सांस अटक जाती है.. पीयूष तो है भी पतला सा फिर भी.. ये तो हाथी जैसा है.. नहीं रे नहीं.. ” कांप उठी थी कविता
दोनों अपना समय बर्बाद कर रहे थे.. चार पाँच मिनट बीत गई.. अभी भी रसिक ने पतीली में दूध नहीं डाला था.. कविता की छोटी छातियाँ.. सुराहीदार गर्दन.. कान में छोटी छोटी बालियाँ.. रसिक मुग्ध होकर कुदरत की बनाई इस खूबसूरत मास्टरपीस को देख रहा था.. यार, ये लड़की अभी मेरा पानी निकलवा देगी.. मुझे ये दूध का धंधा ही बंद कर देना चाहिए.. रोज सुबह इन खूबसूरत बलाओं के बबले देखकर हालत खराब हो जाती है मेरी..
“तुम दूध दे रहे हो या मैं जाऊ?” कविता ने कहा
“दे रहा हूँ.. दे रहा हूँ.. रुकिए जरा.. ” रसिक के हाथों में दूध का केन था.. केन का ढक्कन खोलने के लिए जो चाकू था वो साइकिल के हेंडल में फंसा हुआ था.. “जरा वो चाकू निकाल दीजिए ना भाभी.. फंस गया है.. ”
रसिक के मुंह से फंस जाने की बात सुनकर कविता को अपनी संकरी चुत में उसका लंड फँसने की कल्पना मन में दौड़ने लगी.. अपने आप पर ही हंसने लगी कविता.. मन भी अजीब है.. कहाँ कहाँ विचार पहुँच जाते है !!
“हंस क्यों रही हो भाभी?” रसिक ने पूछा
“इतना फिट क्यों घुसा रखा है चाकू?”
“ओर कहीं रखने की जगह ही कहाँ है साइकिल में.. !! यहाँ रखता हूँ तो फिट हो जाता है साला.. रोज तो शीला भाभी खींचकर एक झटके में निकाल देती है.. पर आपको तकलीफ होगी.. शीला भाभी अनुभवी जो ठहरी.. पहली बार करो तब सबको तकलीफ होती ही है.. क्यों सच कहा ना मैंने भाभी?” रसिक द्विअर्थी भाषा में बातें करने लगा
“पहली बार तो शीला भाभी को भी तकलीफ हुई होगी.. कोई ऊपर से सीखकर थोड़े ही आता है.. धीरे धीरे कोशिश करें तो सब आने लगता है”
“ये क्या सुबह सुबह रसिक के साथ माथा फोड़ रही है तू.. चल अंदर.. खाना बनाने की तैयारी कर” पीछे से अनुमौसी की आवाज आई
अपनी सास की आवाज सुनते ही कविता ने तेजी से रसिक के हाथों से दूध का पतीला लिया.. और ऐसा करते वक्त दोनों के हाथों का स्पर्श हो गया..
“मम्मी, मैं तो कब से लेने के लिए तैयार खड़ी हूँ.. ये रसिक ही कमबख्त मुझे दे नहीं रहा” कविता ने भी द्विअर्थी संवादों का दौर जारी रखा.. कविता के मुख से ऐसी सांकेतिक भाषा सुनकर रसिक खुश हो गया
कविता दूध लेकर अंदर चली गई और रसिक आगे निकल गया
वैशाली को देखकर शीला खुश हो गई.. उसके आने से ही पूरा घर भरा भरा सा लगने लगा.. २७ साल की फेशनेबल, भरे भरे जिस्म वाली, एकदम गोरी और बॉब कट हेयर स्टाइल वाली वैशाली.. एकदम बातुनी लड़की थी.. वो और शीला दोनों बातें करने लगे.. वैशाली ने अपने पापा के बारे में पूछा और शीला ने उसे उसके पति संजय और ससुराल के बारे में बातें की
बातों ही बातों में वैशाली ने शीला को बताया की वो ससुराल में बिल्कुल भी खुश नहीं थी.. उसका पति संजय अपने काम पर ध्यान ही नहीं देता था और बार बार नौकरियों से निकाल दिया जाता था.. पूरा दिन सिगरेट फूंकता रहता था.. शराब पीता था.. दोस्तों से ब्याज पर पैसे उधार लेता था और जब लौटा न पाएं तब शहर छोड़कर भाग जाता था.. पूरा दिन घर पर कोई न कोई वसूली करने आ पहुंचता था.. वैशाली उसे टोकती तो वो अनाब शनाब बोलकर उसे हड़का देता.. उसके सास-ससुर भी संजय की इस स्थिति के लिए वैशाली को जिम्मेदार ठहराते.. ससुर के पेंशन से घर आराम से चल तो रहा था पर उसकी सास बात पर उसे ताने मारती रहती थी। अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए वैशाली फुट फुट कर रोने लगी.. शीला ने उसकी पीठ पर हाथ सहलाकर उसे शांत किया.. अपनी माँ के साथ दुख बांटकर वह काफी हल्का महसूस करने लगी।
शीला: “तू चिंता मत कर बेटा.. मेरे होते हुए.. मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी”
शीला की बात सुनकर वैशाली के दिल को थोड़ी तसल्ली मिली.. वैशाली का मूड ठीक करने के लिए शीला ने कहा “तू आराम से टीवी देख.. मैं तेरी पसंद का कुछ अच्छा खाने के लिए बना देती हूँ”
शीला किचन में गई और वैशाली पैर पर पैर चढ़ाकर आराम से टीवी देखने लगी.. मायके में आकर बेटियों को एक अनोखी शांति का एहसास होता है.. दोपहर में माँ बेटी ने खाना खाया और फिर से बातें करने लगी.. शाम के साढ़े पाँच कब बज गए पता ही नहीं चला..
शीला ने फोन करके कविता को घर बुलाया और उसकी पहचान वैशाली से करवाई..
शीला: “कविता, तू और वैशाली एक ही हमउम्र हो.. तू इसे कंपनी देना.. वैशाली, ये कविता है.. अपने अनुमौसी के बेटे पीयूष की पत्नी.. बहोत ही अच्छा स्वभाव है इसका.. तुम दोनों की साथ में अच्छी पटेगी.. ”
दोनों लड़कियों की दोस्ती होने में समय नहीं लगा.. एक दिन में तो दोनों एकदम खास सहेलियाँ बन चुकी थी.. दोनों देर रात तक साथ बैठती और बातें करती रहती.. रोज रात को खाना खाने के बाद दोनों वॉक पर जाने लगी.. इन दोनों की दोस्ती से अनुमौसी और पीयूष भी बड़े खुश थे।
रात को वॉक पर जाते वक्त, वैशाली टाइट टीशर्ट और छोटी सी शॉर्ट्स पहनकर निकलती.. टीशर्ट के अंदर ब्रा भी नहीं होती थी.. चलते चलते हर कदम के साथ उसके उछलते हुए वक्ष देखकर कविता को अपने मायके की याद आ जाती.. लड़की अपने मायके में बिना किसी बंधन के कितने आराम से रहती है !! ससुराल में तो पूरा दिन “ये करो.. ये मत करो.. ऐसे मत बैठो.. ऐसे कपड़े मत पहनो” ऐसी रोकटोक में ही जीवन निकल जाता है..
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