शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)-27
(Desi Kahani) 7
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शीला ने केलेंडर में देखा.. अभी डेढ़ महीने की देरी थी मदन के लौटने में.. अब की बार तो मैं उसे वापिस जाने ही नहीं दूँगी.. क्या रखा है परदेश में? यहाँ पत्नी बिस्तर पर करवटें ले रही हो और पति परदेश में मजदूरी कर रहा हो.. ये भी भला कोई ज़िंदगी है !! शीला को बड़ी ही तीव्रता से मदन की याद आने लगी.. आज रात उसका फोन आना चाहिए.. जल्दी आजाओ मदन..
छत पर खड़े खड़े किसी से फोन पर बातें करते हुए पीयूष को बगल के घर में शीला भाभी अपने कमरे के सोफ़े पर बैठी हुई नजर आ रही थी.. उसकी नजर शीला से मिलते ही दोनों की आँखें चमक उठी.. शीला के उभारों को देखते हुए पीयूष को रेणुका के बबलों की याद आ गई.. शीला भाभी के बॉल बड़े थे पर रेणुका के स्तन कसे हुए थे.. पर अगर शीला भाभी को एक बार भोगने के लीये मिल जाएँ तो मैं रेणुका भाभी की तरफ देखूँ भी नहीं.. आह्ह.. पीयूष के लंड में एक झटका लगा.. यार.. ये शीला भाभी की नाभि कितनी सेक्सी है !! बिल्कुल कयामत सी.. एक बार चांस मिल जाएँ तो उनकी नाभि को चोदना है.. इतनी मस्त गहरी नाभि है की आधा लंड समा जाएँ अंदर..
पीयूष के दिमाग से शीला भाभी हट ही नहीं रही थी.. ज्यादातर रूप और कामुकता एक साथ एक व्यक्ति में कम ही नजर आते है.. शीला भाभी के पास उन दोनों का जादुई मिश्रण था.. कातिल हुस्न.. आलीशान व्यक्तित्व.. और चुंबकीय स्वभाव.. पीयूष दीवाना हो चुका था उनका.. दूसरी तरफ कविता ऐसा महसूस कर रही थी की पीयूष का उसके तरफ ध्यान कम होता जा रहा था.. वो सोच रही थी की शायद मैं पिंटू की तरफ ढलती जा रही हूँ उस वजह से तो शायद ऐसा लग रहा हो.. कविता ये जानती थी की शादी के बाद उसे पिंटू से नाता तोड़ लेना चाहिए था.. पर कमबख्त दिल का क्या करें.. कितनी कोशिशों के बाद भी वह अपने पहले प्रेम को दिल से निकाल नहीं पा रही थी
दूसरे दिन पीयूष फोन करके राजेश की ऑफिस पहुँच गया.. राजेश ने इंटरव्यू लेकर उसे एक हफ्ते के लिए अपॉइन्ट किया.. और उसे अपनी ऑफिस के मेनेजर महेंद्र के नीचे नियुक्त कर दिया.. पीयूष ने बाहर निकलकर सब से पहले रेणुका भाभी को फोन कर ये समाचार दिए.. बाद में कविता को और अंत में शीला भाभी को फोन किया और अपनी नौकरी लगने की खुशखबरी दी.. राजेश ने पीयूष को एक हफ्ते के लिए उसका काम देखकर नौकरी पक्की करने और तनख्वाह तय करने का वादा किया.. अपनी योग्यता और मेहनत पर पीयूष को पूरा भरोसा था. उसने तय किया की वह पूरे दिल से मेहनत करेगा और राजेश को शिकायत का एक भी मौका नहीं देगा..
पीयूष की नौकरी शुरू हो गई.. तीसरे ही दिन.. मेनेजर महेंद्र ने पीयूष के हाथों में एक बंद कवर रखा और कहा की ये कवर वो अपनी पत्नी को दें.. ये पीयूष की पत्नी के लिए था.. पीयूष अचंभित होकर सोचता रहा की कवर में ऐसा क्या था !!
शाम को घर आकार उसने कविता के हाथ में कवर रख दिया
कविता: “क्या है ये?”
पीयूष: “कवर तेरे हाथों में ही.. तू ही खोलकर बता.. मेरी ऑफिस से दिया है.. और कहा है की तेरे लिए है”
कविता: “मुझे भला कोई क्यूँ कवर भेजेगा तेरी ऑफिस से? नौकरी मैं कर रही हूँ या तुम?”
पीयूष: “अरे यार.. तू वो सब छोड़.. और कवर खोल.. मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा”
कविता ने कवर खोला.. एक एग्रीमेन्ट था जिसमें पीयूष की नौकरी को स्थायी कर दिया गया था और साथ ही उसकी तनख्वाह २५००० तय की गई थी.. और साथ में एक चिट्ठी थी जिसमें लिखा था
“प्रिय पीयूष,
तुम्हें मेरी कंपनी में पर्मनन्ट नौकरी देते हुए मुझे खुशी हो रही है.. मेरी कंपनी को तुम्हारे जैसे होनहार कर्मचारी की जरूरत थी। एक हफ्ते के काम को तीन ही दिन में खतम कर तुमने अपनी योग्यता सिद्ध कर दी है.. मैं अपने स्टाफ को कभी नौकर नहीं समझता.. अपने परिवार का हिस्सा ही समझता हूँ.. इसलिए शनिवार रात को तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को मेरे साथ डिनर पर आने का न्योता दे रहा हूँ.. मेरे परिवार में तुम्हारा स्वागत है.. धन्यवाद और अभिनंदन.. शनिवार शाम को ७:४५ को तुम्हें अपनी पत्नी के साथ होटल मनमन्दिर में आना है.. हमारी ऑफिस का अन्य स्टाफ भी साथ डिनर करेगा.. हर महीने के आखिरी शनिवार को हमारी कंपनी डिनर के लिए मिलते है ताकि पूरा स्टाफ और उनके परिवारजन आपस में मिल सकें.. स्टाफ के साथ पहचान बढ़ाने का तुम्हारे लिए ये अच्छा अवसर रहेगा..
शुभेच्छा सह
राजेश”
ये पढ़कर कविता उछल पड़ी और पीयूष से लिपट गई.. पीयूष और कविता दोनों ही बेहद खुश थे.. पीयूष ने भी कविता के स्तनों को दबाते हुए उसे चूम लिया.. दोनों बेडरूम के अंदर ही थे.. पति और पत्नी एक दूसरे को उत्तेजना प्रदान करने लगे.. और साथ ही साथ एक दूसरे के वस्त्रों को भी उतारने लगे.. दोनों जिस्म नंगे होते ही पीयूष भूखे भेड़िये की तरह कविता पर टूट पड़ा.. कविता भी पीयूष के लंड को मुट्ठी में दबाते हुए अपने संतरों जैसे स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ने लगी.. पीयूष का शरीर उत्तेजना से तप रहा था.. उसका लंड कविता के हाथों में ठुमक रहा था.. पीयूष ने ऊपर उठकर अपना लंड कविता के मुंह में दे दिया.. कविता बड़े प्यार से पीयूष के सुपाड़े को चूसते हुए उसके आँड़ों को सहलाने लगी.. पीछे की तरफ झुककर पीयूष ने कविता की छोटी सी क्लिटोरिस को मसलकर उसे उत्तेजना से पागल कर दिया..
“आह्ह कविता.. और जोर से चूस.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. ” पीयूष तेजी से कविता की क्लिटोरिस को रगड़ रहा था। दूसरे हाथ से उसने कविता के एक स्तन को मरोड़ दिया.. पीयूष ने अपना लंड अब कविता के मुंह से बाहर निकाला और वो कविता की प्यारी पुच्ची को चाटने लगा.. सिहर रही कविता आँखें बंद कर ये सोच रही थी की ऑफिस से आए खत में जो लिखाई थी.. वो पिंटू से काफी मिलती झूलती क्यों लग रही थी? स्कूल में वो पिंटू को पास बैठकर ही पढ़ती थी इसलिए उसकी लिखाई से वो परिचित थी..
दिमाग में पिंटू का खयाल आते ही कविता में एक अनोखा जोश आ गया.. अपनी चुत चाट रहे पीयूष को बिस्तर पर पटक कर वो उस पर सवार हो गई.. उंगलियों के बीच उसके लंड को पकड़कर अपनी चुत के छेद को उसपर रख दिया और धीरे धीरे बैठ गई.. लंड अंदर घुसते ही उसने बेतहाशा कूदना शुरू कर दिया.. पीयूष लाचार होकर कविता के प्रहारों को लेटे लेटे झेल रहा था.. उछलते हुए कविता ने अपने बाल खोल दिए.. और मदहोश होकर आँखें बंद कर ऊपर नीचे करती ही रही.. खुले हुए बाल.. जंगली जानवर जैसी उत्तेजना..लाल चेहरा.. बंद आँखें.. पीयूष एक पल के लिए उसे देखकर डर सा गया.. बेरहमी से कविता पीयूष पर कूदती ही रही.. उसके कड़े स्तन.. और उत्तेजना के कारण बंदूक की तरह तनी हुई उसकी निप्पलें.. पीयूष ने मसलना शुरू कर दिया.. पागलों की तरह कूद रही कविता जैसे ही अपनी मंजिल पर पहुंची तब “ओह माय गॉड” कहते हुए लंड से उतार गई और बिस्तर पर लेटकर हांफने लगी..
अब बारी पीयूष की थी.. उसने हांफ रही कविता की जांघें चौड़ी की.. और उसकी गीली मुनिया में एक ही झटके में अपना लंड घुसेड़ दिया.. उसके हर धक्के के साथ कविता कराह रही थी.. कुछ ही धक्कों के बाद पीयूष ने अपना व्हाइट ज्यूस कविता की तंग चुत में दे मारा.. और उसकी छाती पर गिर गया.. लंड को चुत की अंदर ही रखे हुए.. वो दोनों गहरी नींद में.. उसी अवस्था में सो गए..
रोज की तरह कविता जल्दी जाग गई.. सो रहे पीयूष को अपने शरीर से धकेलते ही “पुचच.. ” की आवाज के साथ उसका लंड चुत से बाहर निकला.. पीयूष को सहलाकर वो खड़ी हुई और गाउन पहनकर दूध लेने अपने कंपाउंड में आई..
कविता ने शीला के घर की तरफ नजर डाली.. अंदर लाइट जल रही थी.. ये देख कविता सोचने लगी.. लगता है अभी अभी जागी है शीला भाभी.. पता नहीं खाली बिस्तर के साथ कैसे रात बिताती होंगी बेचारी.. !! दो साल से अकेली रहती है.. रसिक अभी आया नहीं था.. कविता ने सोचा की तब तक नहाने के लिए पानी गरम करने गैस पर रख दूँ
गैस पर गरम पानी का पतीला चढ़ाकर वो अपने मोबाइल पर मेसेज चेक कर रही थी तभी रसिक की साइकल की घंटी सुनाई दी.. अपना मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म पर रखकर उसने पतीली उठाई और दूध लेने के लिए बाहर आई..
अंधेरे में बाहर जो द्रश्य उसे दिखा उससे कविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई.. रसिक ने शीला भाभी को जकड़कर रखा था.. वो चिल्लाने ही वाली थी की तब उसे ये एहसास हुआ की रसिक जबरदस्ती नहीं कर रहा था.. बल्कि शीला भाभी अपनी मर्जी से उससे लिपटी हुई थी.. कविता को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.. शीला भाभी जैसी सुशील संस्कारी स्त्री.. दूधवाले के साथ?? छी छी छी.. घिन आ गई कविता को शीला भाभी पर
शीला का ये रोज का खेल था.. रसिक जब भी दूध देने आए तब अंधेरे का फायदा उठाकर मजे कर लेती थी.. शीला के बोझिल जीवन में इससे रस बना रहता था.. और रसिक को भी मज़ा आता था.. शीला और रसिक किसी ने भी कविता को देखा नहीं था.. दोनों अपनी ही मस्ती में मस्त थे.. थोड़ी ही देर के बाद रसिक ने शीला को दूध दिया.. और उसके साथ जो भी दे सकता था वो देकर अनुमौसी के दरवाजे की तरफ आया.. हाथ में पतीली लिए कविता तैयार खड़ी थी..
“कैसी हो भाभी? आज आप दूध लेने आई? मौसी सो रही है क्या?”
कविता ने नफरत भरे सुर के साथ कहा “तुम अपने काम से काम रखो.. मैं दूध लेने आउ या मम्मी आए.. तुम्हें क्या फरक पड़ता है? तुम बस दूध दो और चलते बनो”
“इतना गुस्सा क्यों कर रही हो भाभी.. मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया.. ”
“क्यों? दूध देने के अलावा मौसी का और कुछ भी काम था तुम्हें?”
सुनकर रसिक चोंक गया “अरे भाभी.. मुझे बस दूध का हिसाब लेना था उनसे.. और कोई काम नहीं था.. ” दूध देकर रसिक चला गया।
कविता का शक और भी दृढ़ होने लगा.. कहीं मेरी सास भी शीला भाभी के साथ इन गुलछर्रों में शामिल तो नहीं हो गई !! कुछ कहा नहीं जा सकता
दोपहर को काम निपटाकर कविता शीला भाभी के घर आई.. वो जानना चाहती थी की भाभी उससे और क्या क्या छुपा रही थी
बातों ही बातों में उसने पूछ लिया “भाभी.. आपने मदन भाई के अलावा और किसी के साथ सेक्स किया है कभी??”
शीला चोंक गई.. अचानक कविता ने आज ये सवाल क्यों पूछा !!
“देख कविता.. अपना पाप हम खुद ही जानते है.. ये केवल माँ ही जानती है की उसका बेटा किसकी पैदाइश है.. इशारों को अगर समझो.. राज को राज रहने दो.. ” शीला गीत गुनगुनाकर कविता को आँख मार दी.. संकेत साफ था.. वो कविता और पिंटू के संबंधों की ओर इशारा कर रही थी
कवित सोच में पड़ गई.. भाभी ने तो मुझे ही शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया..
“आप ऐसे बात मत बदलिए.. सच सच बताइए ना.. ”
शीला: “देख कविता.. गोल गोल मत घुमा.. तेरे दिमाग में क्या चल रहा है मुझे बात दे.. ”
शीला और कविता के बीच जिस तरह से लेस्बियन संबंध विकसित हो चुके थे उसके बाद एक दूसरे से शर्माने की कोई आवश्यकता नहीं थी
कविता: “भाभी, मैंने आज सुबह आपको और रसिक को एक साथ देखा.. आप को और कोई नहीं मिला जो एक दूधवाले के साथ.. छी छी.. मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है”
अपने चेहरे पर जरा से भी शिकन लाए बगैर शीला ने शांत चित्त से कविता की जांघ पर हाथ रखकर कहा
शीला: “तेरी बात सही है कविता.. पर मेरी तरह अगर तू ८५५ रातें बिना पति के गुजार कर फिर ये बात बोल रही होती तो तेरी बात का वज़न भी पड़ता.. ” कविता स्तब्ध हो गई
कविता: “भाभी.. मैं सिर्फ इतना कह रही थी की कहाँ वो रसिक और कहाँ आप?? कोई तुलना ही नहीं है.. ”
शीला: “कविता, एक ५५ साल की.. ढलती जवानी से गुजर रही स्त्री.. किस मुंह से किसी अच्छे घर के लड़के को प्रपोज करेगी.. ये सोचा है तूने कभी? तू अगर पिंटू के साथ पकड़ी भी जाए तो लोग ये समझकर माफ कर देंगे की बच्चे है.. गलती हो जाती है.. पर अगर इस उम्र में लोगों को मेरे बारे में कुछ पता चले तो पूरा समाज थू थू करेगा.. मेरी परेशानी को समझ”
कविता ने कुछ जवाब नहीं दिया.. शीला भाभी की मनोदशा उसे धीरे धीरे समज आने लगी
शीला ने अपनी बात आगे चलाई “एक तरफ लोगों की भूखी नज़रों को मैं नजर अंदाज करती रहती हूँ.. दूसरी तरफ खुद अपने जिस्म की आग से झुलस रही हूँ.. कोई कब तक बर्दाश्त करें !! मैं भी आखिर एक इंसान हूँ.. मेरी भी जरूरतें है.. ८५५ रात कम नहीं होती कविता.. मुझे रसिक के पास वो सुख मिला जो मेरे पति के पास कभी नहीं मिला था.. ”
कविता: “मतलब? कौन सा सुख?”
शीला: “वो तू अभी समझ नहीं पाएगी.. जब तेरी उम्र होगी.. तू मेनोपोज़ से गुजरेगी.. तब तुझे समझ आएगा”
कविता: “नहीं भाभी.. मुझे समझाइए ना.. प्लीज। आज नहीं तो कल.. मैं भी उस अवस्था से गुजरूँगी.. आपका मार्गदर्शन तब काम आएगा”
शीला ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात शुरू की
शीला: “ऐसा है कविता… एक-दो डिलीवरी के बाद.. स्त्री के गुप्तांग में ढीलापन आ जाता है.. और मेनोपोज़ के बाद शरीर के अंदर विशिष्ट तब्दीलियाँ होती है.. सेक्स की इच्छा तीव्र हो जाती है.. दूसरी तरफ बढ़ती उम्र के कारण पति के लंड में पहले जैसी सख्ती नहीं रहती.. उत्तेजित होने में भी समय लगता है.. और उत्तेजित हो भी जाएँ तो तुरंत वीर्य स्खलित हो जाता है.. ऐसी सूरत में स्त्री को एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है.. एक तो योनि के शिथिल होने से संभोग में ठीक से मज़ा नहीं आता.. और ऊपर से पति दो तीन धक्कों में ही झड़ जाता है.. इसलिए संतोष ही नहीं मिल पाता.. ”
कविता ध्यानपूर्वक शीला भाभी की बातें सुन रही थी..
कविता: “अच्छा.. इसीलिए बड़ी उम्र की स्त्रीओं को जवान लड़के ज्यादा पसंद आते है.. हैं ना!!”
शीला: “कोई कोई पसंद आ जाता है.. पर हर बार ऐसा नहीं होता.. दूसरी बात.. तू आज रात घर पर जाकर.. पीयूष के लंड से ज्यादा मोटी चीज अपनी चुत में डालकर देखना.. और फिर बताना की मज़ा आया की नहीं!!”
कविता: “क्यों? मतलब मैं समझी नहीं”
शीला: “मतलब.. मेरे पति के मुकाबले रसिक का लंड ज्यादा मोटा है.. और मोटे लंड से चुदवाने में हमेशा मज़ा आता है.. ढीले ढाले भोसड़े की अंदरूनी दीवारों के साथ जब मोटे लंड का घर्षण होता है तब इतना मज़ा आता है.. मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती”
कविता: “रसिक का लंड मोटा है मतलब….आपने उसके साथ.. !!!”
शीला: “बड़ा ही मस्त है रसिक का.. तू तो ले भी नहीं पाएगी उसका.. चीखें मारकर मर जाएगी अगर लेने की कोशिश भी करेगी तो.. !!” रसिक का लंड याद आते ही शीला का भोंसड़ा पनियाने लगा.. ये विवरण सुनकर कविता भी सकपकाने लगी
कविता: “माय गॉड.. इतना मोटा है रसिक का?”
शीला: “कुछ ज्यादा ही मोटा.. नॉर्मल लंड से दोगुना मोटा”
कविता: “कितना मोटा होगा? वो मूसल जितना?” किचन में प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े मूसल की तरफ इशारा करते हुए कविता ने कहा। उस दौरान उसने मन ही मन पीयूष और पिंटू के लंड की तुलना उस मूसल से कर ली थी.. मूसल काफी मोटा था
शीला: “ये तो कुछ भी नहीं है.. ” कहते हुए शीला ने कविता के सामने ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया और चुत खुजाते हुए मुठ लगाने लगी.. अपनी चार उंगलियों को एक साथ अंदर बाहर करते हुए उसने कविता से कहा “देख तू.. कितनी ढीली हो गई है.. अब ऐसे में पतला लंड कहाँ से मज़ा देगा मुझे?? तेरी चुत में मुश्किल से दो उँगलियाँ जाती होगी”
कविता भी गरम होने लगी थी “हाँ भाभी.. दो उँगलियाँ डालती हूँ तो भी बहुत दर्द होता है” उसकी तेज सांसें बता रही थी की वह कितनी उत्तेजित हो गई थी.. मोटे लंड के बारे में बातें करते ही उसकी चुत में हलचल होना शुरू हो गया था
कविता: “अब ये सारी बातें सुनकर मुझे मोटा लंड देखने का बड़ा मन कर रहा है भाभी”
शीला: “कैसी बातें कर रही है तू !! लंड को गाजर मुली थोड़ी न है जो फ्रिज से निकाला और तुझे दिखा दिया !!” ठहाका लगाकर हँसते हुए बोली
कविता इस जोक पर जरा भी नहीं हंसी.. वह इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की सोफ़े पर ही अपनी चुत रगड़ने लगी.. जब शीला उसके सामने धड़ल्ले से नंगे भोंसड़े में उँगलियाँ पेल रही थी तो वो भी इतनी छूट तो ले ही सकती थी..
शीला: “अंदर इतनी चूल मची है तो फिर ऊपर ऊपर से क्यों कर रही है !! खोल दे और डाल अपनी उँगलियाँ अंदर”
कविता: “ओहह भाभी.. आपने ये सारी नंगी बातें कर मुझे इतना गरम कर दिया.. मुझसे रहा नहीं जा रहा अब.. भाभी.. आप मेरी चुत में आज तीन उँगलियाँ डालिए.. देखते है क्या होता है”
शीला समझ गई की कविता मोटे लंड जैसा असर महसूस करना चाहती थी
शीला: “दर्द तो नहीं होगा ना तुझे ??”
कविता: “होने दो दर्द अगर होता है तो.. प्लीज डालिए” कहते हुए कविता ने अपना स्कर्ट ऊपर कर दिया और पेन्टी को घुटनों से सरकाते हुए उतार दी..
शीला: “एक बार अगर तू रसिक का लंड देखेगी ना.. तो भूल जाएगी की वो एक दूधवाला है.. ओह.. उसे याद करते ही मेरा पानी निकलने लगा.. “अंदर डाली हुई चार गीली उंगलियों को बाहर निकालकर उसने कविता को दिखाया
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