शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)-10
"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी
"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी
रसिक के निकलते ही शीला ने अपने घर को ताला लगाया.. और अनु मौसी के घर की तरफ दौड़ते हुए गई..
घड़ी में तीन बज रहे थे.. थकान के उतरते ही वह तीनों फिर से एक दूसरे को छेड़ने लगे.. शीला सिगरेट के कश लगाते हुए धुएं को जीवा और रघु के मुंह पर छोड़ रही थी...
बिस्तर तो पहले से ही शराब गिरने से गीला था.. जीवा ने शीला के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और जबरदस्त उत्तेजित होकर चूसने लगा.. शीला भी इस चुंबन का प्रति-उत्तर देते हुए...
लंड को चुत की और चुत को लंड की जरूरत तब से पड़ती आई है जब से मानवजात का इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ.. शीला बस यही खयालों में थी की कब रात हो और जीवा का मूसल जैसा लंड…
रसिक की फटी हुई कमीज देखकर शीला शर्म से लाल हो गई.. "रुको में तुम्हारे भैया को कोई शर्ट लाकर देती हूँ.. " अलमारी से तुरंत एक शर्ट निकालकर उसने रसिक को दीया।
ऐसे ही बातचीत करते रहने के बाद रूखी चली गई। उसके साथ हुए इस मजेदार संभोग को याद करते करते शीला ने रात का खाना खाया और सो गई। बिस्तर पर लेटकर आँखें बंद करते ही उसे रूखी के मदमस्त…
"अरे, उसमें कौन सी बड़ी बात है!! मुझे तो इतना दूध आता है की मेरे लल्ला का पेट भर जाता है फिर भी बचता है। कभी कभी तो लल्ला पीते पीते सो जाता है... और छाती पूरी खाली न हो…
शाम के पाँच बज रहे थे... धोबी का लड़का कपड़े देने आया था.. उसे देखकर शीला का दिल किया की उसे पटाकर ठुकवा ले..
शीला रात को १० बजे रसोईघर की जूठन फेंकने के लिए बाहर निकली... थोड़ी देर पहले ही बारिश रुकी थी। चारों तरफ पानी के पोखर भरे हुए थे... भीनी मिट्टी की मदमस्त खुशबू से ठंडा वातावरण बेहद कामुक बना