शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)-12

(Desi Kahani) 4

redwalker69 2026-04-28 Comments

This story is part of a series:

अखबार को सोफ़े पर फेंककर चेतना पिंटू की जांघों पर सवार हो गई.. और उसके बिल्कुल सामने की तरफ हो गई। पिंटू के मासूम चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में भरते हुए उसके गालों को सहलाने लगी और बड़ी ही कामुक अदा से बोली

 

चेतना: “हाय रे पिंटू.. कितना चिकना है रे तू!! तुझे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा है मेरा” कहते हुए चेतना ने पिंटू के होंठों को चूम लिया.. चिंटू ने अपने दोनों हाथों से चेतना के कूल्हें पकड़ लिए.. और उन्हे सहलाने लगा..

 

चेतना ने पिंटू के पतलून की चैन खोली और उसके सख्त लंड को बाहर निकाला.. बिना वक्त गँवाए उसने अपना घाघरा उठाया और अपनी रसीली चुत की दरार पर पिंटू के सुपाड़े को सेट करते हुए अपने जिस्म का वज़न पिंटू की जांघों पर रख दिया.. पिंटू का लंड चेतना की चुत में ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सर से सिंग!!

 

शीला एक प्लेट में गरमागरम पकोड़े लेकर बाहर आई तब इन दोनों को चुदाई करते हुए देखकर हंस पड़ी.. और मन ही मन बोली.. साली ये चेतना भी.. इस बेचारे बच्चे की जान ही ले लेगी आज.. शीला ने एक गरम पकोड़ा लिया और चेतना के खुले नितंब पर दबा दिया

 

चेतना: “उईई माँ.. क्या कर रही है हरामी साली!!!” बोलते हुए चेतन उछल पड़ी.. उसके उछलते ही पिंटू का लंड उसकी चुत से बाहर निकल गया.. वह उत्तेजना से थर-थर कांप रही थी.. पिंटू का लंड भी झूल रहा था..

 

शीला ने पकोड़े की डिश को टेबल पर रखा और पिंटू के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. शीला के मुंह की गर्मी.. पिंटू और बर्दाश्त न कर सका.. और बस दस सेकंड में उसके लंड ने इस्तीफा दे दिया.. पिंटू का वीर्य मुंह में भरकर शीला किचन में चली गई। चेतन से अब और रहा न गया.. अपना घाघरा ऊपर करते हुए वह क्लिटोरिस को रगड़ने लगी.. अपनी चुत की आग को बुझाने की भरसक कोशिश कारणे लगी.. पर उसकी चुत झड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी।

 

आखिरकार उसने पिंटू को सोफ़े पर लिटा दिया और उसके मुंह पर सवार हो गई.. और इससे पहले की पिंटू कुछ कर पाता.. वह उसके मुंह पर अपनी चुत रगड़ने लगी.. करीब पाँच मिनट तक असहाय पिंटू के मुंह पर चुत रगड़ते रहने के बाद.. उसकी चुत का फव्वारा निकल गया.. बेचारा पिंटू.. चेतना के इस अचानक हमले से हतप्रभ सा रह गया..

 

थोड़ी देर यूं ही लेते रहने के बाद वह उठा और कपड़े ठीक किए.. उसकी हालत खराब हो गई थी.. वह बुरी तरह थक चुका था.. अपने लंड को पेंट में डालकर उसने चैन बंद की और बिना कुछ कहे वह दरवाजा खोलकार चला गया.. नाश्ता करने भी नहीं रुका.. इन दोनों भूखे भोसड़ों की कामवासना ने उसे डरा दिया था… वह दुम दबाकर भाग गया

 

शीला और चेतना ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की.. क्यों करती!! उनका काम तो हो गया था.. अनमोल ऑर्गैज़म प्राप्त कर दोनों सहेलियाँ पकोड़े खाते हुए बातों में मशरूफ़ हो गई।

 

चेतना: “मस्त पकोड़े बनाए है तूने” खाते हुए बोली

 

शीला: “चेतना.. क्या सच में तेरे पति का खड़ा नहीं होता?”

 

चेतना: “इतना निकम्मा भी नहीं हुआ है अब तक.. पर हाँ.. पहले की तरह जल्दी सख्त नहीं होता.. और होता भी है तो एकाध मिनट में बैठ जाता है”

 

कहते हुए चेतना उदास हो गई.. शीला ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.. “मैं समझ सकती हूँ की तुझ पर क्या बीत रही होगी.. मैंने भी मदन की गैरमौजूदगी में दो साल बिताए है.. तू अब से मेरे घर आया कर.. तुझे तड़पना नहीं पड़ेगा.. ”

 

चेतना: “इसी लिए तो मैं घर पर आकर बात करने के लिए बोल रही थी.. ऐसी बातें बाहर खुले में करना ठीक नहीं”

 

शीला: “सच कहा तूने चेतना.. इस उम्र में जब जिस्म की भूख सताती है तब ऐसी स्थिति होती है की ना सहा जाता है और ना कहा जाता है”

 

चेतना: “एक बात पूछूँ शीला? सच सच बताना.. मदन भाई दो साल से गए हुए.. इतने समय तू बिना कुछ किए रह पाई यह बात मैं मान नहीं सकती”

 

शीला: “सच कह रही है तू.. मैंने तो अपने दूधवाले को जुगाड़ लिया है.. रोज सुबह सुबह तगड़ा लंड मिल जाता है”

 

चेतना: “मेरा भी उसके साथ कुछ चक्कर चला दे शीला.. ” विनती करते हुए चेतना ने कहा.. तगड़े लंड का नाम सुनकर उसके दो पैरों के बीच के तंदूर से धुआँ निकलने लगा

 

शीला: “अरे तू भी ना.. ऐसे कैसे सेटिंग करवा दूँ.. मैंने भी अभी अभी शुरू किया है उसके साथ!!”

 

थोड़ी देर के लिए दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला

 

चेतना एकदम धीमी आवाज में बोली “बेटे से तो बाप अच्छा है”

 

“मतलब??” शीला समझ नहीं पाई

 

“कुछ नहीं.. जाने दे यार.. चलती हूँ.. वरना मेरी सास फिर से चिल्लाएगी… जैसे मैं किसी के साथ भाग जाने वाली हूँ” चेतना ने एक भारी सांस छोड़कर कहा

 

“तो बोल दे अपनी सास को.. की अपने बेटे से कहे की तुझे ठीक से चोदे.. वरना सचमुच भाग जाऊँगी.. एक औरत बिना आटे के जीवन गुजार लेगी पर बिना खूँटे के तो एक पल नहीं चलेगा” शीला ने कहा

 

“बिना खूँटे के तो मेरी सास को भी नहीं चलता.. दिन में दो दो बार अपनी चुत चटवाती है मेरे ससुर से.. ”

 

“बाप रे!! क्या बात कर रही है तू!! तुझे कैसे पता चला?” शीला आश्चर्यसह चेतन की ओर देखती रही

 

“कई बार रात को उनके कमरे में चल रही गुसपुस सुनती हूँ.. मेरा ससुर भी कुछ काम नहीं है.. खड़े हुए ऊंट की गांड मार ले ऐसा वाला हरामी है कुत्ता.. साला” चेतना ने कहा

 

“कमाल है यार!! इस उम्र में भी!! तेरा ससुर रंगीला तो था ही.. याद है.. तेरे देवर की शादी में मेरे बूब्स को कैसे घूर घूर कर देख रहा था” शीला ने कहा

 

“हाँ यार.. चल अब मैं चलती हूँ.. बहोत देर हो गई.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे मेरा.. ”

 

“ठीक है.. पर आती रहना.. ”

 

“तू बुलाएगी तो जरूर आऊँगी.. और ऐसा कुछ भी मौका मिले तो मुझे याद करना.. अकेली अकेली मजे करती रहेगी तो एड्स से मर जाएगी.. मिल बांटकर खाने में ही मज़ा है.. मेरी चुत का भला करेगी तो उपरवाला तेरा भी ध्यान रखेगा” हँसते हुए चेतना ने कहा और चली गई

 

शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही

 

शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही

 

शीला का शातिर तेज दिमाग दौड़ने लगा.. उसका दिमाग हर तरह के हलकट विचार करने के लिए सक्षम था.. और जब वह अपने दिमाग और चुत, दोनों का उपयोग कर सोचती.. तब उसे कोई न कोई तरकीब सूझ ही जाती।

 

उस रात को शीला ने पिंटू को फोन लगाया और उससे गरमागरम बातें करते हुए अपनी चुत में उंगली घिसकर उसे शांत कर दिया।

 

रसिक अब हर रोज थोड़ा जल्दी आ जाता और पंद्रह मिनट में शीला को चोदकर दूध देने निकल जाता.. पर शीला को इस जल्दबाजी वाली ठुकाई में ज्यादा मज़ा नहीं आता था। पर बिना सेक्स के रहने से तो ये अच्छा ही था..कम से कम खेलने, चूसने और चुदवाने के लिए एक तगड़ा लंड तो मिला.. यही सोचकर वह समय व्यतीत कर रही थी।

 

एक दिन सवेरे सवेरे मंदिर जाते हुए उसे अनुमौसी मिल गई। शीला को देखते ही उससे बातें करने रुक गई।

 

अनुमौसी: “अगले रविवार को हमारा महिला मण्डल यात्रा पर जा रहा है… तुझे चलना है?”

 

शीला: “हाँ मौसी.. मेरा नाम भी लिखवा देना.. मैं जरूर चलूँगी”

 

अनुमौसी: “ठीक है.. सुबह सात बजे निकलना है.. तू तैयार रहना.. फिर से वो दूधवाले के साथ उलझ मत जाना.. वरना देर हो जाएगी तो बस छूट जाएगी”

 

रसिक का जिक्र होते ही शीला के कान चार हो गए.. जिस तरह सवार की एडी लगते ही घोड़े के कान चौकन्ने हो जाते है.. बिल्कुल उसी तरह

 

शीला: “अरे नहीं नहीं मौसी.. मैं आपसे पहले तैयार हो जाऊँगी.. आप देखना!!”

 

अनुमौसी: “कितना बोलती है रे तू!! ठीक है.. तू तैयार हो जाएँ फिर हम साथ में निकलेंगे” कहते हुए अनुमौसी मंदिर की ओर चल दी

 

शीला पूरे दिन सोचती रही.. मौसी ने रसिक का जिक्र क्यों किया!!! कुछ तो राज था.. वरना अनुमौसी ऐसे ही उसका नाम नहीं लेती.. कल रसिक को पूछती हूँ इसके बारे में

 

जैसे तैसे शीला ने दोपहर तक का समय निकाल ही दिया.. पर फिर उससे रहा नहीं गया.. दोपहर के तीन बजे उसने रसिक को फोन किया.. पर उस चूतिये ने फोन उठाया ही नहीं। पक्का खेत में किसी मज़दूरन की टांगें चौड़ी कर उसकी चुत को पावन कर रहा होगा!!

 

शीला ने रूखी को फोन मिलाया..

 

रूखी: “अरे भाभी आप?? कैसे है? आप तो मुझे भूल ही गए!!”

 

शीला: “नहीं भूली हूँ तुझे.. पर लगता है तू मुझे भूल गई है शायद.. जीवा का डंडा क्या मिल गया तू तो मुझे याद ही नहीं करती!!”

 

रूखी: “सच कहूँ तो भाभी मैं आपको ही याद कर रही थी.. आप अभी फ्री हो?”

 

शीला: “हाँ बता.. कुछ खास काम था क्या?”

 

रूखी: “हाँ भाभी.. आपको एक चीज दिखानी थी.. पर उसके लिए आपको यहाँ मेरे घर पर आना पड़ेगा”

 

शीला: “तेरे घर?? पर किस बहाने आऊँ तेरे घर रूखी??”

 

रूखी: “आप एक काम कीजिए.. साथ में एक पतीली लेकर आइए.. कोई पूछे तो कहना की दूध लेने आई हो”

 

शीला: “ठीक है फिर”

 

रूखी: “कितनी देर में आओगी भाभी?”

 

शीला: “१५-२० मिनट में पहुँचती हूँ”

 

रूखी: “ठीक है.. पर जल्दी आना”

 

शीला मोबाइल कट करते हुए सोचने लगी.. ऐसा क्या होगा जो रूखी मुझे दिखाना चाहती है!! और जल्दी आने के लिए क्यों कहा!! क्या पता!! जाकर देखती हूँ तब सब पता चल जाएगा..

 

शीला झटपट तैयार हो गई.. और हात में पतीली लेकर निकल पड़ी.. वैसे तो अगर चल कर जाएंग तो २५-३० मिनट में रूखी के घर पहुँच सकती थी पर शीला ने ऑटो बुला ली.. कमीना ऑटो वाला मिरर सेट करके उसके स्तनों को अपनी नज़रो से ही चूस रहा था.. इस उम्र में भी उसके स्तन पुरुषों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे ये देखकर शीला को अच्छा लगा.. उसने जानबूझकर अपना पल्लू गिरा दिया.. और विंध्य पर्वतों के बीच जैसी खाई होती है वैसी अपने स्तनों के बीच की खाई को उजागर कर दिया..

 

स्त्री के स्तनों को देखकर मर्द लोग सदियों से उत्तेजित होते आए है.. स्त्री कितनी भी भद्दी क्यों न हो.. उसके उरोज हमेशा आकर्षक होते है। और हर स्त्री को यह पता होता है की इस अमोघ शस्त्र का उपयोग कर कैसे अपने काम निकलवाए जा सकते है

 

रिक्शा वाला भी सीटी बजाते हुए शीला के दोनों गुंबजों को ताक रहा था.. जान बूझकर वो रिक्शा को धीमी गति पर चला रहा था ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक शीला के स्तनों को देख सकें.. जानबूझकर खड्डे वाले रास्ते पर ऑटो चलाता था ताकि उन स्तनों को उछलते हुए देख सकें। अब वह गीत भी गुनगुनाने लगा था “चोली के पीछे क्या है.. चुनरी के नीचे”

 

शीला समझ गई की वह क्या देखकर गाना गा रहा था.. १० मिनट के रास्ते में भी कमीने ने २० मिनट लगा दिए.. पहुंचकर जब शीला ने भाड़ा देने के लिए अपने ब्लाउस से पर्स निकाला तब रिक्शा वाले ने पैसे लेने से माना क्या और कहा “मैडम, आपके जैसे ग्राहक मिल जाएँ तो पूरा दिन अच्छा जाता है” आँख मारते हुए वह रिक्शा लेकर चला गया..

 

शीला रूखी के घर पहुंची.. और दरवाजा खटखटाया.. रूखी ने दरवाजा खोलकर शीला को हाथ से खींचकर अंदर लिया और दरवाजा बंद कर लिया।

What did you think of this story

Comments