शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)-37
(Desi Kahani) 6
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शर्म की सारी सीमाएं तोड़कर चेतना ने संजय का लंड पकड़ लिया.. चेतना की मुठ्ठी में लंड दबते ही संजय जैसे उसका ग़ुलाम बन गया.. और चेतना मस्त हो गई.. लंड की तलाश में ही तो वो शीला के घर आई थी.. वह अब खड़ी हुई और अपने ब्लाउस के सारे हुक खोलकर संजय के होश उड़ाने के लिए तैयार हो गई.. ब्रा निकालकर वो संजय के ऊपर भूखी शेरनी की तरह टूट पड़ी..
संजय के जिस्म को हर जगह पागलों की तरह चूमते हुए उसने उसका शर्ट और बनियान उतरवा दिए.. उतना ही नहीं.. पेंट की क्लिप खोलकर, अंडरवेर के साथ वो भी उतार दिया.. संजय अब पूरा नंगा था.. उसका पूरा शरीर बालों से ढंका हुआ था.. सारा संचालन अपने हाथ में ही रखना चाह रही चेतना घुटनों के बल बैठ गई.. संजय के फुँकारते लंड को चूम लिया और फिर आँखें बंद करके पूरा लंड मुंह में लिया और चूसने लगी..
बेबस संजय.. लाचार होकर चेतना को अपना लंड चूसते देखता ही रहा.. दोनों हाथों से चेतना का सर पकड़कर वोह धक्के लगाते हुए.. उसके मुंह को ही चूत समझकर चोदने लगा.. जिस तरह चेतना बिना किसी विरोध के चुदवाने के लिए आसानी से तैयार हो गई ये देखकर संजय को आश्चर्य हुआ। वरना औरतों को लंड मुंह में लेने के लिए कितनी मिन्नते करनी पड़ती है वो संजय जानता था.. प्रेमिला को तो नया ड्रेस खरीद कर देने का वादा करो तभी मुंह में लेती थी.. और वो भी सिर्फ थोड़ी देर के लिए..
चेतना की हवस देखकर संजय को मज़ा ही आ गया.. वह उसके मुंह में धनाधन धक्के लगाता जा रहा था.. चेतना भी संजय के कड़े लंड को चूसकर धन्य हो गई थी.. उसने संजय को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया.. बालों से ढंका हुआ संजय डरावने भालू जैसा लग रहा था पर चेतना को इससे कोई फरक नहीं पड़ता था क्योंकि उसकी नजर केवल उसके लंड पर थी। संजय के जिस्म पर सवार होते हुए चेतना ने अपनी ब्रा, साड़ी और घाघरा उतार दिया और मादरजात नंगी हो गई..
चेतना के मादक गदराए जिस्म को देखकर संजय मंत्रमुग्ध हो गया और उसका लंड ठुमकने लगा.. संजय के फुँकारते लंड को देखकर चेतना से ओर रहा न गया.. अपनी दोनों जांघों को फैलाते हुए वो संजय के मुख पर अपनी चूत के होंठों को रखकर बैठ गई और झुककर उसके लंड को फिरसे मुंह में लेकर चूसने लगी.. एक दो मिनट तक उसके लंड को मुंह के अंदर पीपरमिंट की तरह घुमाने के बाद उसने लंड बाहर निकाला और नीचे हो रही चूत चटाई का आनंद लेने लगी.. असह्य उत्तेजना से बेकाबू होकर वो अपनी चूत को संजय के मुंह के ऊपर दबा देती.. संजय का दम घुटने लगा.. चेतना की इस आक्रामकता ने उसे झकझोर दिया..
चेतना की क्लिटोरिस को अपने दोनों होंठों के बीच दबाकर चूसते हुए संजय, चूत के कामरस को भी चाट रहा था.. चेतना अब संजय के लंड को मन भरकर निहारने लगी.. लंड की लंबाई, परिघ.. मोटाई.. सुपाड़े का रंग.. खून के भरावे से फुली हुई नसें.. खूंखार था उसका लंड.. चेतना की मुठ्ठी में बस आधा लंड ही समाता था.. उस पर से उसने लंड की लंबाई का अंदाजा लगा लिया.. मस्त और अद्भुत!!
चेतना ने अब संजय के अंडकोशों को पकड़कर दबाते हुए लंड के मूल से लेकर टोपे तक चाटकर गीला कर दिया.. संजय दो पल के लिए चूत चाटना छोड़कर इस चुसाई का मज़ा लेते हुए पागल सा होने लगा.. अद्भुत भारी और बड़े बड़े.. सांड जैसे अंडकोश.. पुष्ट वीर्य से भरपूर.. !! चेतना ने लंड को पकड़कर ऐसे खींचा की संजय बिस्तर से एक फुट ऊपर उछल पड़ा.. चेतना को जो चाहिए था वो मिल गया.. झांटों से भरपूर आँड उसके मुंह के बिल्कुल सामने थे जिसे उसने गप्प से मुंह में भर लिया.. ऐसे चूसने लगी जैसे गोलगप्पा मुंह में डाला हो..
चेतना की इस अदा का दीवाना हो गया संजय!! इस कामुक मुख मैथुन का भरपूर मज़ा उठाते हुए वो सिसकने लगा..
संजय: “आह्ह चेतना.. यू आर मेकिंग मी क्रेजी.. आई लव यू.. ओह्ह.. यू आर सकीन्ग लाइक अ बीच.. ओह यस.. !!”
चेतना ओर उत्तेजित हॉक दोगुने जोश के साथ संजय के लंड और आँड को चाटने लगी.. अपने मुंह से वैक्यूम क्लीनर की तरह वो लंड को चूस रही थी.. “ओह्ह नो.. ओह नो.. !!” कहते हुए संजय उछला और उसके साथ ही लंड ने पिचकारी छोड़ दी.. चेतना के सर के ऊपर बालों तक वीर्य की धार जाके लगी.. उसके सारे बाल वीर्य से मिश्रित होकर चिपचिपे हो गए.. मुठ्ठी भी वीर्य से भर गई.. गजब का फ़्लो था संजय के लंड का.. बड़े ही अहोभाव सो वो ठुमकते हुए लंड की तड़प को देख रही थी.. वो सोचने लगी.. ऐसा तो क्या होता होगा वीर्य स्त्राव के वक्त जो लंड इतना ठुमकता होगा??
अब चेतना की चूत में गजब की चुनचुनी हो रही थी.. जो अब किसी भी हाल में वह सह नहीं पा रही थी.. उसने अपनी मांसल जांघों के बीच संजय के सर को दबा दिया.. संजय की मुछ पर अपनी क्लिटोरिस को रगड़ते हुए वो बेतहाशा उछल रही थी.. संजय अपनी जीभ से क्लिटोरिस को उकसाते हुए दबा रहा था.. थोड़ी ही देर में चेतना ने अपनी चूत को उठाके पटक दिया और अपने अमृत की धारा सनज के मुंह में छोड़ दी.. हवस की आंधी थम जाने से संजय ने चैन की सांस ली.. अब चेतना की जांघों से उसे मुक्ति मिलने की आशा थी.. चेतना ने भी अपना शरीर ढीला छोड़ दिया.. और संजय के शरीर पर गिर गई.. बिना योनि प्रवेश के दोनों झड़ गए थे..
दोनों एक दूसरे के जिस्मों को सहलाते हुए थकान उतारने लगे.. ऑर्गैज़म की थकान भी कितनी मीठी लगती है!! चेतना संजय के हारे हुए सैनिक जैसे ढल चुके लंड पर हाथ पसार रही थी.. उसके स्तन संजय की छाती से दबकर चपटे हो गए.. संजय उसके नग्न कूल्हों को सहला रहा था और उसकी गांड की लकीर में उँगलियाँ फेरते हुए छिद्र को गुदगुदा रहा था.. चेतना को अंदाजा लग गया की उसके पीछे के छेद को क्यों टटोला जा रहा था.. उसने तुरंत कमर हिलाकर संजय की उंगलियों से अपने छेद को दूर हटा दिया.. संजय ने गांड को छोड़ कर उसकी चूत पर ध्यान केंद्रित किया.. चूत पर स्पर्श होते ही चेतना के जिस्म में नए सिरे से चुदवाने की भूख जागृत हो गई.. तो दूसरी तरफ चेतना के जिस्म की गर्मी से संजय का लंड भी अंगड़ाई लेकर जाग गया..
लंड को हरकत करता देख चेतना की आँखों में चमक आ गई.. अपने कामुक हाथों में उस अर्ध-जागृत यंग को लेकर उसने दबाकर देखा.. अभी तक लंड की सख्ती चूत में घुसाने लायक नहीं हुई थी.. पर संजय अब फिर से चेतना की चूत पर पहुंचकर फिर से चाटने लगा था.. दोनों 69 की पज़िशन में सेट हो गए थे.. चेतना अपनी उंगलियों से लंड की चमड़ी को पीछे करने लगी.. जैसे बादल छटते ही पूर्णिमा का सुंदर चाँद बाहर निकलता है.. वैसे ही चमड़ी पीछे सरकाते ही सुंदर सुपाड़ा बाहर निकला.. उसे देखते ही चेतना को बेहद प्यार आया.. अपनी चिपचिपी चूत को वो संजय के मुंह पर रगड़ रही थी..
संजय का लंड अब तैयार होकर यहाँ वहाँ झूलने लगा था.. उस मस्त लोड़े को चूम कर चेतना चूसने लगी.. उसकी उत्तेजना को परखकर संजय ने चाटते हुए अपनी एक उंगली अंदर घुसेड़ दी..
चेतना: “बहोत मज़ा आ रहा है.. ओह्ह संजय.. फक यार.. आह्ह”
चूत में उंगली अंदर बाहर होते ही चेतना एकदम मस्त हो गई.. संजय जान चुका था की लोहा अब गरम हो चुका था.. उसने अपनी दूसरी उंगली चेतना की गांड के छेद पर दबा दी.. चूत के रस से भीगी हुई उंगली ने गांड के छेद को भिगोकर रेशम जैसा मुलायम कर दिया.. इस बार चेतना ने कोई विरोध नहीं किया.. क्योंकि वह खुद भी बेहद उत्तेजित थी.. संजय की उंगली गांड के अंदर पूरी घुस चुकी होने के बावजूद उसे दर्द का एहसास नहीं हो रहा था.. या फिर अगर हो भी रहा था तो वो दर्द के चूत में उंगली घुसने से मिल रहे आनंद के तले दबकर रह गया था
संजय ने बड़ी मुश्किल से अपने वीर्य को स्खलित होने से रोक रखा था.. जिस तरह चेतना उसके सुपाड़े से खेल रही थी उसका लंड पिचकारी मारने के लिए उतावला हुए जा रहा था.. चेतना अब पूर्ण रूप से उत्तेजित होकर बेकाबू सी होने लगी थी.. काफी समय से बिना लंड के रहने की वजह से उसकी ये दशा हो गई थी.. उसकी आक्रामकता का एक कारण यह भी था की वह इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहती थी.. फिर ये जाम-ए-मोहब्बत मिले ना मिले!! वह आज संजय के लंड से तृप्त होना चाहती थी..
संजय चेतना के दोनों मस्त बबलों को मसल रहा था.. चेतना भी अब पूरी तरह संजय के लंड पर टूट पड़ी.. संजय को आश्चर्य हो रहा था की ७ इंच लंबा लंड वह कितनी आसानी से निगल रही थी..
“ओह्ह चेतना.. बस भी कर अब.. कितना चुसेगी? तेरा तों मन ही नहीं भरता.. पता है तुझे.. कितना कंट्रोल करना पड़ रहा है!! अभी निकल जाता मेरा.. आह्ह.. ”
चेतना अब पलंग पर लेट गई.. बिना चूत की चुदाई के अगर संजय का लंड झड़ गया तो वो प्यासी ही रह जाएगी.. संजय के लंड के स्वागत के लिए उसने अपनी दोनों टांगें चौड़ी कर दी.. संजय चेतना की छाती पर सवार हो गया.. उसने चेतना के दोनों स्तनों को दबाकर एक किया और बीच में अपना लंड घुसेड़कर चोदने लगा.. चेतना को अपने दोनों स्तनों के बीच से आगे पीछे होता हुआ संजय का विकराल सुपाड़ा नजर या रहा था.. उसने अपनी गर्दन थोड़ी सी ऊपर की ताकि वो आगे पीछे होते हुए सुपाड़े को आसानी से चाट सकें.. लंड के इर्दगिर्द चरबीदार स्तनों का दबाव.. और टोपे पर चेतना के कामुक होंठ और जीभ के स्पर्श से ही संजय को ऐसा महसूस होने लगा की वो झड़ जाएगा.. वह तुरंत उसकी छाती से उतर गया..
अब उसने चेतना की चौड़ी टांगों को अपने हाथों से और चौड़ा किया.. और अपने कंधों पर ले लिया.. आहाहाहाहा.. क्या सीन था!! केले के पेड़ के तने जैसी गोरी चिकनी मस्त जांघें.. और उन जांघों के बीच लसलसित बुर की फांक.. मुलायम जांघों पर हाथ फेरते ही.. प्रेमिला और वैशाली दोनों को भूल गया संजय.. उसने अपना सुपाड़ा चेतना की चुत के दरवाजे पर रखा.. गोली छूटने के बाद बंदूक की नली जितनी गरम होती है.. उतना ही गरम महसूस हुआ उस सुपाड़े का स्पर्श चेतना को..
संजय ने अब चेतना को तड़पाना शुरू कर दिया.. अपने टोपे को वो चेतना की क्लिटोरिस पर रगड़ते हुए उसे चूमने लगा.. संजय के इस दोहरे हमले से चेतना के होश उड़ गए.. संजय की लाल आँखें उसे डरा रही थी.. बेकाबू सांड जैसा लग रहा था संजय.. !! चेतना के दोनों हाथों को बिस्तर पर दबाकर लगभग ५ मिनट तक वह उसके होंठ चूसता रहा.. उस दौरान संजय का लंड चेतना की बुर की लकीर पर ऊपर से नीचे तक घिस रही थी.. चेतना के गाल, गर्दन और होंठों को काटते हुए तहस नहस कर दिया उसे संजय ने..
इतनी आक्रामकता के लिए चेतना तैयार नहीं थी.. हालांकि उसकी जिस्म की आग ऐसे रौंदे जाने से बेहद उत्तेजित था.. संजय के हमले के जवाब में चेतना ने भी अपने नाखून इतनी जोर से संजय की पीठ पर गाड़ दिए की उसकी पीठ पर खून के निशान बन गए..
गुस्साए संजय ने खींचकर एक तमाचा रसीद कर दिया चेतना के गोरे गालों पर “मादरचोद.. नाखून मारती है.. !! तेरी माँ को चोदू” कहते ही संजय ने चेतना को बालों से पकड़कर खड़ा कर दिया.. संजय के तेज-तर्रार चाटे से चेतना के कानों में सीटी बजने लगी.. चक्कर आ गया उसे.. दोनों वासना में इतने बेकाबू होकर क्या कर रहे थे उन्हे खुद पता नहीं था.. चेतना की आँखों में आँसू चमकने लगे.. उसने भी गुस्से में आकर संजय के लंड को पकड़कर इतनी जोर से खींचा की वह अपना संतुलन खो बैठा.. संजय को जरा भी अंदाजा नहीं था की चेतना जवाबी हमला करेगी.. उसका लंड दर्द करने लगा.. गुस्से में आकर उसने एक साथ दो उँगलियाँ चेतना की गांड में डाल दी..
चेतना ने अपनी चीख को बड़े ही मुश्किल से रोक रखा.. वह मजबूर थी.. ऐसे अनजाने गेस्टहाउस में उसकी चीख सुनकर अगर लोग इकठ्ठा हो गए तो उसकी ही बदनामी होती.. लेकिन जिस्म का दर्द ऐसी किसी भी मजबूरी के परे होता है.. वह थोड़ी समझता है?? दबाने के बावजूद हल्की सी चीख तो निकल ही गई.. संजय अब चेतना के स्तनों को ऐसे बेरहमी से मसल रहा था जैसे उसमें जान ही न हो..
चेतना की नजर संजय के सख्त खड़े लंड पर गई.. देखते ही उसकी चूत में चुनचुनी होने लगी.. कितने दिनों से उसकी भूखी चूत.. चुदने के लिए बेताब होकर आँसू बहा रही थी.. संजय ने चेतना को पकड़कर उल्टा कर दिया.. उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर कर दिया.. चेतना अब कुत्तिया की तरह चार पैरों पर हो गई.. संजय ने चेतना के गोरे चूतड़ों पर धड़ाधड़ तमाचे लगाकर उन्हे लाल कर दिया.. चूत के छेद पर सुपाड़ा टीकाकार उसने एक जबरदस्त धक्का लगाया.. चेतना जोर से कराही.. उसकी चूत की दीवारें फाड़कर संजय का आधा लंड अंदर घुस गया.. दूसरा दमदार धक्का लगते ही चेतना की चूत की किल्ला फतेह हो गया..
भख भख धक्के लगाते हुए संजय ने अपनी लय प्राप्त कर ली.. दोनों हाथों से मस्त कूल्हों को चौड़ा कर गांड के छेद में उंगली करते हुए वह बेरहमी से चोदने लगा.. चेतना भी अब बेहद उत्तेजित हो चुकी थी.. लंड के प्रत्येक धक्के से उसे इतना मज़ा आ रहा था की गांड के दर्द को उसने नजरअंदाज कर दिया.. इस तरह चुदवाने में चेतना को बहोत मज़ा आ रहा था.. संजय भी चेतना की टाइट चूत को बड़ी मस्ती से चोद रहा था.. उसकी जांघें चेतना के भव्य कूल्हों से टकराकर एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि उत्पन्न कर रही थी.. पूरा कमरा फ़च फ़च की आवाज से गूंज रहा था..
चेतना ने अपनी चूत की दीवारों को भींच लिया.. लंड पर अधिक दबाव महसूस होते ही संजय को धक्के लगाने में मज़ा आ गया.. करीब १० मिनट तक धक्कों का दौर यूँही चलता रहा.. चेतना की महीनों पुरानी भूख आज मिट रही थी.. एक हल्की सी कराह के साथ संजय के लंड ने इस्तीफा दे दिया.. उसके गरम वीर्य की बौछार से चेतना की बंजर चूत में बहार सी छा गई.. सुखी धरती पर बारिश की प्रथम बूंद के साथ जैसे धरती तृप्त हो जाती है वैसे ही चेतना तृप्त हो गई..
दो मिनट तक संजय का ठुमकता लंड चूत के अंदर पानी छोड़ता रहा और फिर दोनों बेड पर हांफते हुए गिर गए.. संजय का एक हाथ चेतना के मस्त उरोज पर था.. हल्के हाथों से वह उसका मर्दन कर रहा था.. करीब पंद्रह मिनट तक यूँही निष्क्रिय पड़े रहने के बाद दोनों सामान्य हो गए.. चेतना ने संजय के गाल पर किस किया
चेतना: “संजय, आज का दिन मैं कभी नहीं भूलूँगी.. दोबारा कब मिलेंगे ये तो बता नहीं सकती.. पर हाँ.. तू अपना मोबाइल नंबर मुझे दे देना.. मौका मिलते ही मैं तुझे कॉल करूंगी.. ”
संजय ने चेतना को बाहों में भरकर एक झकझोर देने वाला आलिंगन दिया.. फिर वह उठ खड़ा हुआ और बाथरूम में चला गया.. चेतना भी उसके पीछे बाथरूम में गई और कमोड पर बैठकर मूतते हुए वो पेशाब कर रहे संजय के लंड को देखती रही.. देखकर ही उसे इतना प्यार आया की उसने मूत रहे लंड को अपनी मुठ्ठी में भर लिया.. और उस मूत्र को संजय के लंड और आँड़ों पर मल दिया.. चेतना की मुठ्ठी से अपना लंड छुड़ाकर संजय ने अपनी पेशाब की धार का निशाना उसके स्तनों पर लगाया.. गरम गरम पेशाब से चेतना के दोनों स्तन भीग गए.. वह सारा मूत्र स्तनों से गुजरकर नाभि पर होते हुए चेतना की क्लिटोरिस से टपक कर कमोड में गिरने लगा..
लंड की चमड़ी को पीछे कर अपने सुपाड़े को दबाते हुए संजय अटक अटक के पेशाब कर रहा था.. चेतना का हाथ पकड़कर उसने खड़ा किया और उल्टा मोड दिया.. हल्का सा धक्का देने पर चेतना नीचे झुक गई.. अपने मूत रहे लंड को संजय ने चेतना की गीली चूत में आधा घुसा दिया और चूत में ही मूतने लगा.. इस विचित्र और विकृत हरकत से चेतना भी मस्त हो गई.. मूत्र की आखिरी गरम पिचकारी अपनी बच्चेदानी पर महसूस होते ही चेतना को इतना मज़ा आया की वह सिसकने लगी..
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