शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)-36
(Desi Kahani) 6
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काफी देर तक शीला बाहर सोच में डूबी खड़ी रही.. उसे आश्चर्य हुआ की अब तक वैशाली बाहर क्यों नहीं आई?? कुछ हुआ होगा क्या? कहीं संजय ने वैशाली पर हाथ तो नहीं उठाया होगा?? शीला कांप गई.. क्या करू!! अंदर जाऊ की नहीं?? शीला ने दरवाजे पर कान लगाकर सुनने का प्रयत्न किया लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई.. बहोत दिनों के बाद मिले है.. तो कुछ कर तो नहीं रहे होंगे? पर वैशाली तो कह रही थी की उसे संजय की परवाह ही नहीं है.. शीला का दिमाग तेजी से चल रहा था
तभी बाहर के दरवाजे पर दस्तक हुई.. शीला ने दरवाजा खोला तो उसकी सहेली चेतना खड़ी थी.. शीला का चिंतित चेहरा देखकर चेतना सकपका गई.. उसे लगा की शायद वो गलत वक्त पर आ गई.. शीला ने उसे अंदर तो बुलाया पर बिना किसी उत्साह के..
“क्या हुआ शीला?? तेरा चेहरा क्यों उतरा हुआ है?”
शीला: “अरे कुछ खास नहीं.. तू बता.. अचानक कैसे आना हुआ?”
चेतना: “यहाँ से गुजर रही थी.. सोचा तुझसे मिल लूँ.. ”
शीला: “अच्छा किया.. आ बैठ.. मेरी बेटी वैशाली और दामाद आए हुए है एक हफ्ते से”
चेतना: “अच्छा!! कहाँ है वैशाली? बहोत सालों पहले देखा था.. तब तो वो छोटी सी थी.. अब तो मैं उसे पहचान भी नहीं पाऊँगी”
शीला: “अंदर रूम में है.. कपड़े बदल रही है.. अभी आएगी.. तू बता.. और सब ठीक ठाक? घर पर सब कैसे है?”
चेतना और शीला बातें कर रहे थे तभी बेडरूम के अंदर से वैशाली और संजय की जोर जोर से आवाज़ें आने लगी.. शीला समझ गई की दोनों के बीच झगड़ा हुआ था.. तभी वैशाली पैर पटकते बाहर आई.. वैशाली ने चेतना को पहचाना नहीं.. शीला ने उसकी पहचान करवाई “अरे बेटा.. याद है ये चेतना आंटी? हमारे बगल में रहते थे?”
वैशाली ने औपचारिकता से नमस्ते कहते हुए हाथ जोड़े और वहाँ से चली गई
शीला: “लगता है दोनों के बीच कोई कहा-सुनी हो गई है.. तू बुरा मत मानना चेतना.. ”
चेतना: “कोई बात नहीं शीला.. बच्चे है.. ये सब तो चलता रहता है.. तू चिंता मत कर.. पति पत्नी का झगड़ा, रात होते ही बेडरूम में जाकर शांत हो ही जाता है.. ” दिलासा देते हुए चेतना ने कहा
चेतना की बात सुनकर शीला को अच्छा लगा.. थोड़ी देर के बाद संजय बाहर के कमरे में आया.. और इन दोनों के सामने देखे बगैर ही बिना कुछ कहें वो भी घर के बाहर चला गया
चेतना: “शीला, ये है तेरे दामाद??”
चेतना के चेहरे के विचित्र हावभाव देखकर शीला घबरा गई “हाँ ये ही है.. क्यों क्या हुआ??”
चेतना: “नहीं नहीं.. कुछ नहीं.. नाम क्या है इनका??”
“संजय”
चेतना: “शीला, पता नहीं मैं सही हूँ या गलत.. पर इनको तो मैं रोज देखती हूँ” अपने दिमाग पर जोर डालते हुए उसने कहा
चिंतित चेहरे के साथ शीला चेतना को देखती रही..
शीला: “क्या?? क्या बात कर रही है तू? कहाँ देखा है इन्हें?”
चेतना: “सुबह मैं जब दूध लेने निकलती हूँ तब हमारे घर के सामने जो गेस्ट-हाउस हैं उसकी बालकनी में खड़े खड़े सिगरेट फूंकते हुए रोज देखती हूँ मैं.. पर यकीन नहीं हो रहा ये तेरा दामाद है !!”
शीला: “पक्का तू कुछ छुपा रही है.. क्या बात है चेतना?”
चेतना: “कुछ खास नहीं यार.. छोड़ ना.. बेकार में तेरा टेंशन बढ़ेगा.. ”
शीला: “बता न यार.. तुझे मेरी कसम है”
चेतना सोच में पड़ गई.. फिर थोड़ी सी हिचक के साथ बोली “यार बुरा मत मानना.. पर इस आदमी की नजर ठीक नहीं है.. बहोत ही चालू किस्म का आदमी है ये”
शीला: “उसमें कोई नई बात नहीं है.. जो आदमी अपनी माँ समान सास की छातियों को बुरी नजर से तांकता हो.. वो और क्या नहीं कर सकता !!”
चेतना: “क्या सच में? मतलब उसने तुझे भी नहीं छोड़ा?”
शीला: “तुझे भी.. यानि तेरे साथ भी उसने.. !!”
चेतना: “रोज सुबह जब दूध लेने निकलती हूँ तब पूरा रोड सुमसान होता है.. तभी ये आदमी मुझे देखकर गंदे गंदे इशारे करता रहता है… कभी कभी तो उसके साथ एक औरत भी होती है.. उसकी रखैल होगी.. मेरे सामने ही वो उस औरत के बबले दबाता है और चुम्मा-चाटी भी करता है”
शीला: “इसी बात को लेकर मैं टेंशन में हूँ चेतना.. वैशाली और संजय की जरा भी नहीं बनती.. पूरा दिन दोनों झगड़ते रहते है.. लेकिन मुझे ये अंदाजा नहीं था संजय की ज़िंदगी में कोई ओर लड़की भी है !!”
चेतना: “देख शीला.. मैं ये दावे के साथ तो नहीं कह सकती की जो लड़की उसके साथ थी वो उसकी रखैल ही होगी.. पर जिस तरह का वो गेस्ट-हाउस है.. वहाँ शरीफ लोग नहीं जाते है.. सिर्फ ऐसे ही लफंगे लफड़ेबाज लोग जाते है.. उसी आधार पर मैं अंदाजा लगा रही हूँ”
शीला: “सही बोल रही है तू.. आज कल हॉटेलों और गेस्टहाउस में यही सब तो चलता है.. यार चेतना.. तू मेरा एक काम करेगी?”
चेतना: “हाँ हाँ बोल ना.. ”
शीला: “तू मेरे दामाद के बारे में और जानकारी हासिल कर सकती है क्या? वो कितने दिनों से गेस्टहाउस में है.. वो लड़की कौन है… उसका संजय से क्या ताल्लुक है वगैरह वगैरह.. ”
चेतना: “पर ये सब जानकार तू क्या करेगी शीला?”
शीला: “मुझे यकीन है की वैशाली को इसके बारे में सब पता है पर वो मुझे बता नहीं रही.. ये सब बातें जानना जरूरी है.. बता ना.. मेरी मदद करेगी ना?”
चेतना: “मदद तो करूंगी.. पर देखना यार.. कहीं मैं फंस न जाऊ.. मैं आई थी किस काम से और ये सब क्या हो रहा है”
शीला: “कुछ नहीं होगा.. तुझ पर आंच भी नहीं आने दूँगी.. ठीक है ना !! और तू किस काम से आई थी ये तो बता”
चेतना: “क्या बताऊ शीला.. !! उस दिन पिंटू के साथ प्रोग्राम करने के बाद मैं कोरी की कोरी ही हूँ.. मेरा पति मेरी एक नहीं सुनता.. खाना खाके सो ही जाता है.. अब इस सावन में मैं बिना भीगे तड़प रही हूँ.. कुछ सेटिंग कर यार.. पिंटू को वापिस बुला”
शीला: “अरे पगली.. पिंटू तो कविता का प्रेमी है.. वो ऐसे हमारे बुलाने से थोड़े ही आएगा.. !! उस दिन तो हमने उसे चुदाई सिखाने के बहाने चुदवा लिया था.. अब बार थोड़े ही बुला सकते है.. !!”
चेतन निराश हो गई.. “तो अब क्या करें?”
शीला: “देख यार चेतना.. मुझसे अगर कुछ बन पड़ता तो मैं जरूर करती.. पर तू देख रही है ना.. वैशाली की मौजूदगी में किसी को घर पर बुला नहीं सकती”
चेतना: “यहाँ न सही.. मेरे घर पर तो किसी को भेजना का कुछ सेटिंग करवा दे”
शीला हंस पड़ी.. कुहनी से चेतना की कमर पर धक्का लगाकर बोली “नालायक.. मैं कोई दल्ली हूँ जो तू मुझसे ऐसा पूछ रही है?”
चेतना: “शीला, मुझे पक्का यकीन है.. की तू ऐसे दो-तीन को तो जानती ही होगी.. तेरा स्वभाव पहले से ऐसा ही रहा है.. तू किसी एक के भरोसे कभी नहीं होती.. तेरे पास विकल्प होते ही है”
शीला ने जवाब नहीं दिया.. चेतना की बात भी सही थी.. शीला के भोसड़े के रजिस्टर में पिंटू के बाद और कितने नए नाम जुड़ चुके थे.. !! पीयूष, रसिक, जीवा और रघु..
शीला: “एक बात बता.. तेरे घर के आसपास का माहोल कैसा है? मतलब अगर किसी को भेजूँ तो कोई रिस्क तो नहीं है ना ??”
चेतना: “वैसे रिस्क तो कोई नहीं है.. पर हाँ अगर कोई अनजान आदमी अकेला आएगा तो अड़ोस पड़ोस वाले जरूर देखेंगे.. उससे अच्छा अगर तू भी साथ आए तो देखना वाला यही सोचेगा की कोई पति-पत्नी मिलने आए है.. फिर किसी को शक नहीं होगा”
चेतना की चुदने की इस तड़प को देखकर शीला को दया आ गई.. उसकी मदद तो करनी ही होगी.. पर वैशाली का क्या करू? चेतना के घर ही पूरा दिन निकाल जाएगा.. और अभी वैशाली और संजय के बीच जो हुआ उसके बाद उसे वैशाली को अकेला छोड़कर जाना ठीक नहीं लग रहा था.. ऊपर से पिछली बार जब वैशाली को अकेला छोड़ा था तब उसने हिम्मत को घर बुला लिया था
शीला चुपचाप ये सब सोचते हुए चेतना को देखती रही.. चेतना बड़ी ही बेसब्री से शीला के जवाब की प्रतीक्षा कर रही थी.. शीला उसके गोरे गोरे मम्मों को ब्लाउस के अंदर से ऊपर नीचे होते हुए देखती रही..
शीला: “ठीक है.. मैं कुछ जुगाड़ करती हूँ.. इतने दिन इंतज़ार किया है तो कुछ दिन ओर सही.. सब्र का फल मीठा होता है.. मुझे कुछ प्लान बनाने में वक्त लगेगा.. मैं कल तुझे फोन करती हूँ.. एक आदमी है मेरी नजर में.. तुझे मस्त कर देगा”
चेतना: “पर शीला तू भी साथ आना.. अकेले में मुझे बहुत डर लगेगा किसी अनजान मर्द के साथ”
शीला: “मैं जब भी उसे लेकर तेरे घर आऊँगी उसके 2 घंटे पहले तुझे फोन कर के बता दूँगी.. ठीक है!!”
चेतना: “ठीक है.. वैसे तो शाम तक रुकना था तेरे साथ.. पर वैशाली की मौजूदगी में कुछ हो नहीं पाएगा.. ”
शीला: “और हाँ.. ये ले पिंटू का मोबाइल नंबर.. जब तक में कुछ सेटिंग करू तब तक तू फोन पर उसके साथ टाइमपास करना.. !!” कागज के एक छोटे से टुकड़े पर शीला ने पिंटू का नंबर लिखकर दिया.. चेतना ने कागज पर्स के अंदर रखा और खड़ी हो गई
शीला: “तेरा काम तो हो जाएगा.. पर तू मेरा काम मत भूलना”
चेतना: “कौन सा काम? अच्छा.. वो दामाद वाला.. हाँ हाँ नहीं भूलूँगी.. तू चिंता मत कर.. काम हो जाएगा”
चेतना के जाते ही शीला का दिमाग चलने लगा.. कहाँ गई होगी वैशाली?? संजय का उसके साथ किस बात को लेकर झगड़ा चल रहा होगा? चेतना ने जिस लड़की को संजय के साथ देखा है.. कौन होगी वो? प्रेमिका या रखैल? आज कल के मर्दों का कोई भरोसा नहीं.. हो सकता है कोई वेश्या हो.. यहाँ अपना ससुराल होने के बावजूद गेस्टहाउस में रहने का क्या मतलब? सब कुछ पता करने के बाद ही में कुछ कदम उठा सकूँगी..
वैशाली कविता के घर पहुँच गई थी… और संजय नुक्कड़ की टपरी पर खड़ा होकर सिगरेट फूँक रहा था
शीला के घर से निकालने के बाद जैसे ही चेतना टपरी के करीब से गुजरी.. तब उसने संजय को देखा.. वो ओर तेजी से चलते हुए आगे निकल गई.. संजय भी उसके पीछे पीछे चलने लगा था.. सीटी बस-स्टेंड पर खड़े खड़े चेतना १२४ नंबर की बस के इंतज़ार में थी..
बस आते ही वो अंदर बैठ गई.. संजय भी बस में चढ़ गया और चेतना की बगल की सीट पर बैठ गया.. चेतना को बड़ा आश्चर्या हुआ.. संजय का कंधा उसके कंधे से छूते ही चेतना के भूखे शरीर में करंट सा दौड़ गया.. वो कुछ बोली नहीं.. कंडक्टर के आते ही संजय ने दोनों की टिकट ले ली..
चेतना: “आपने मेरा टिकट क्यों लिया? मैं तू आपको जानती तक नहीं..!!”
संजय: “पर मैं तो आपको जानता हूँ.. रोज सुबह देखता हूँ आपको जब आप दूध लेने जाती हो”
चेतना: “मेरे जाते वक्त कौन मुझे देखता है उससे मुझे क्या लेना देना?”
संजय ने जवाब नहीं दिया.. दोनों चुपचाप बैठे रहे.. तभी चेतना का स्टेंड आ गया
संजय: “आपको एतराज न हो तो गेस्टहाउस पर मेरे कमरे पर चलिए.. थोड़ी देर बैठ कर बातें करेंगे”
चेतना: “तुम पागल हो क्या? मेरे घर के एरिया में अगर मुझे कोई गेस्टहाउस में जाते हुए देखेगा तो कोई क्या सोचेगा?”
संजय समझ गया.. चेतना को आने में दिक्कत नहीं थी.. उसे डर था तो किसी के देख लेने का
संजय ने हाथ दिखा कर एक रिक्शा को खड़ा रखा..
संजय: “आपको गेस्टहाउस में आने से ही दिक्कत है ना !! अगर में आपको किसी ओर जगह ले चलू तो.. ??”
चेतना शर्म से पानी पानी हो गई.. यहाँ बाहर जितनी देर वो खड़ी रहती.. किसी के देख लेने का जोखिम उतना ही बढ़ जाता.. बिना कुछ सोचे चेतना रिक्शा में बैठ गई.. उसका दिल धकधक कर रहा था..
संजय ने रिक्शा वाले से कुछ कहा.. और रिक्शा चल पड़ी.. साथ ही साथ चेतना का दिमाग भी चलने लगा
चेतना शीला को फोन करना चाहती थी पर संजय के साथ होने के कारण यह मुमकिन न था.. बारिश के कारण टूटे हुए रास्तों पर रिक्शा उछल रही थी.. और चेतना का कंधा और जांघ संजय के शरीर के साथ रगड़ रहे थे.. चेतना सोच रही थी.. ३५ दिन गुजर चुके थे.. और उसकी चुत को लंड नसीब नहीं हुआ था.. आखिर कोई कब तक बर्दाश्त करे? संजय के हर स्पर्श के साथ चेतना की चुत में सुरसुरी हो रही थी
रिक्शा एक गेस्टहाउस के पास जाकर रुकी.. यह एरिया चेतना के घर से काफी दूर था.. संजय के पीछे पीछे चेतना तेजी से अंदर घुस गई.. संजय रीसेप्शन पर बात कर रहा था और चेतना का दिल तेजी से धडक रहा था। थोड़ी देर में वेटर चाबी लेकर आया और एक कमरा खोलकर चला गया.. चेतना अंदर जाकर बिस्तर पर बैठी।
रजिस्ट्रेशन निपटाकर संजय कमरे के अंदर आया और दरवाजा बंद कर दिया। उसने पूछा “क्या नाम है आपका?”
“चेतना .. ”
“मस्त नाम है आपका.. मेरा नाम संजय है.. वो तो आपको मेरी सास ने आपको बता ही दिया होगा”
“नहीं नहीं.. मैं तो उन्हे जानती नहीं हूँ.. मैं तो सिलाई का काम करती हूँ.. उनका ब्लाउस देने गई थी” चेतना ने खुद को और शीला को बचाने के लिए झूठ बोला.. संजय को भी यह सुनकर राहत हुई.. उसे डर था की कहीं इसने शीला को उसके और प्रेमिला के बारे में बता न दिया हो
चेतना के स्तनों को ललचाई नजर से देखते हुए संजय के अंदर का पुरुष और खामोश न रह पाया.. ऐसे मौकों पर समय हमेशा कम होता है.. जितना जल्दी मुद्दे पर आया जाएँ.. उतना समय ज्यादा मिलता है काम निपटाने के लिए.. पर कभी कभी जल्दी करने में बात बिगड़ भी जाती है.. और चेतना के पास कितना समय था ये वो जानता नहीं था
चेतना भी घबराहट के मारे सोच रही थी.. यहाँ न आई होती तो अच्छा होता.. किसी ने देख लिया होगा तो? अगर मेरे पति को पता चल गया तो? अगर शीला या वैशाली को पता चल गया तो? इन संभावनाओ को सोचकर ही वो कांपने लगी
एक तरफ डर था.. तो दूसरी तरफ जिस्म की भूख थी.. कुछ तय नहीं कर पा रही थी वो.. एक विचार ये भी आया की ये अच्छा मौका था संजय के बारे में जानकारी हासिल करने का.. उसने शीला को वादा जो किया था.. अगर शीला को पता चल भी गया तो वो ये बोल देगी की संजय के बारे में जानने के लिए उसे उसके साथ गेस्टहाउस आना पड़ा.. भूखी चुत चेतना को वकील की तरह बहस करना सीखा रही थी
चेतना ने अब तय कर लिया था.. जो भी होगा देखा जाएगा.. वैसे भी बंद कमरे के अंदर क्या हो रहा है वो किसको पता चलेगा? पर ये कमीना कुछ कर क्यों नहीं रहा?? बैठे-बैठे सिगरेट चूस रहा है.. जो चूसना चाहिए वो तो चूस नहीं रहा.. चेतना के दिमाग में अनगिनत विचार चल रहे थे
फूँक फूँक कर कदम रख रहा संजय… बुझी हुई सिगरेट को एश-ट्रे में डालकर बोला “मैं स्मोक करू तो आपको दिक्कत तो नहीं है ना!!”
चेतना को गुस्सा आया.. साला सिगरेट फूँक लेने के बाद पूछ रहा है.. उसने कोई जवाब नहीं दिया
संजय ने अपने पत्ते बिछाने शुरू कीये “चेतना, जब भी आपको सुबह सुबह देखता हूँ तब मुझे कुछ कुछ होने लगता है.. आपके अंदर कोई ऐसा आकर्षण है जो मुझे आपके करीब खींचता जा रहा है.. अपने मन को कंट्रोल करने की बहोत कोशिश करता हूँ पर पूरा दिन आप ही मेरे दिलों दिमाग पर छाई रहती हो.. आज तक किसी लड़की या औरत के लिए मुझे ऐसा कभी नहीं हुआ.. फिर आपको देखकर ही ऐसा क्यों हुआ होगा??”
अपनी तारीफ सुनकर किसी भी स्त्री के दिमाग को वश में किया जा सकता है.. ऐसा संजय का मानना था.. तारीफ सुनकर चेतना शर्म से लाल हो गई.. अपने जिस्म को लुटाने के लिए बेताब हो गई.. “ऐसा तो क्या देख लिया आपने मुझ में ? और आपके साथ तो वो सुंदर लड़की हमेशा रहती ही है ना ?”
संजय उठकर चेतना के पास बैठ गया और उसके कंधे पर अपना हाथ रख दिया.. चेतना इस स्पर्श से सिहर उठी.. आगे जो होने वाला था उसकी अपेक्षा में उसका शरीर डोलने लगा.. उसकी हवस अंगड़ाई लेकर जाग गई.. बिना फोरप्ले के.. केवल स्पर्श से ही चेतना की गीली हो गई
संजय चेतना के गालों के सहलाने लगा और उसके साथ ही चेतना ने अपना पल्लू गिरा दिया.. उसकी बड़ी छातियाँ हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थी.. ब्लाउस में कैद उसका मदमस्त जोबन, वी-नेक गले से बाहर झाँक रहा था.. दो स्तनों के बीच की कातिल खाई को देखकर संजय का लंड झटके से खड़ा हो गया..
संजय ने फिर से सिगरेट जलाई.. और उस सिगरेट को चेतना के होंठों पर रखकर कहा “एक दम खींचकर देखो.. मज़ा आ जाएगा” चेतना को सिगरेट की गंध से बड़ी ही नफरत थी.. और सिगरेट कैसे फूंकते है उसका उसे पता न था.. उसने अपना मुंह फेर लिया..
संजय चेतना की गर्दन के पीछे के हिस्से को सहलाने लगा.. इस हरकत से चेतना की आँखें बंद हो गई.. संजय के गरम हाथ का स्पर्श उस उकसा रहा था.. संजय ने सिगरेट चेतना के हाथों में थमा दी और अपनी पेंट की चैन खोलने लगा.. सिगरेट पकड़ना बड़ा ही अटपटा सा लग रहा था चेतना को.. पर संजय का लंड देखा तो वो सब कुछ भूल ही गई.. लंड की गंध और सिगरेट की बू का संमिश्रण ने चेतना के लिए वियाग्रा का काम किया.. उसकी चूत से भांप निकालने लगी थी.. संजय को खड़े लंड को देखकर उसके स्तन सख्त हो गए.. जैसे अभी ब्लाउस फाड़कर बाहर निकाल आएंगे.. अपने लंड को चेतना के उभारों पर और चेहरे पर रगड़ते हुए संजय ने एक हाथ उसके स्तन पर रख दिया.. उभारों पर गरम सुपाड़े का स्पर्श होते ही चेतना बेकाबू होने लगी..
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