शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)-42

(Desi Kahani) 11

redwalker69 2026-05-22 Comments

This story is part of a series:

कविता: “मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है.. इसलिए आपकी मदद मांगने आई हूँ.. रेणुकाजी, आप मुझे कुछ ऐसा तरीका या तरकीब बताइए जिससे मैं पीयूष और पिंटू दोनों को उन माँ-बेटी से बच सकूँ”

 

कविता के घबराहट के मारे ऊपर नीचे होते हुए कच्चे अमरूद जैसे स्तनों को रेणुका देखती ही रही.. और अपनी जीभ न चाहते हुए भी होंठों पर फेर दी.. मन में आए उस विचार को रेणुका ने दिमाग से निकाल दिया.. फिलहाल ऐसे विचारों के लिए योग्य वक्त नहीं था

 

रेणुका: “सोचना पड़ेगा.. रास्ता ढूँढने में और सोचने में थोड़ा वक्त तो लगेगा”

 

कविता: “वक्त ही तो नहीं है मेरे पास.. आज सोमवार है.. गुरुवार और शुक्रवार को छुट्टी लेकर चार दिन घूमने जाने का प्लान है.. कोई तरीका सोचे भी तो उसके अमल के लिए समय तो चाहिए ना”

 

रेणुका: “तू एक काम कर.. बीमारी का बहाना बनाकर पूरी ट्रिप ही केन्सल कर दे”

 

कविता: “नहीं नहीं रेणुकाजी, मेरी बहन और उसकी सहेली का बड़ा मन है घूमने जाने का.. उनका दिल टूट जाएगा”

 

रेणुका: “देख कविता.. तू पिंटू और पीयूष के बारे में डरना छोड़ दे.. अगर वह दोनों सच में तेरे है तो कहीं नहीं जाएंगे.. और जाएंगे भी तो वापिस लौट आएंगे.. अगर नहीं आते तो समझ लेना की वो कभी तेरे थे ही नहीं.. प्यार एक बंधन है.. मन से स्वीकार किया हुआ बंधन.. कोई कैद नहीं.. दूसरी बात.. तू पिंटू के साथ जो कुछ भी करती है.. उस वक्त तुझे पीयूष की याद नहीं आती या कोई अपराधभाव महसूस नहीं होता?? तू पीयूष से ईमानदारी की अपेक्षा तो रखती है पर खुद उस पर अमल तो कर नहीं रही !!!”

 

यह सुनकर कविता का मुंह इतना सा हो गया..

 

कविता: “सच कहूँ रेणुकाजी.. पीयूष का खयाल तो मन में बहोत आता है.. पर जब भी मैं पिंटू के साथ होती हूँ तब मेरा दिमाग काम करना बंद कर देता है.. विवश हो जाती हूँ मैं.. अच्छे-बुरे का फरक भी समझ नहीं आता.. और उसके एक बार बुलाने पर दौडी चली जाती हूँ.. पर पिंटू को मिलने के बाद जब घर लौटकर पीयूष का सामना करती हूँ तब जरूर गिल्टी फ़ील होता है.. बुरा लगता है.. और सोचती हूँ की फिर कभी पिंटू से मिलने नहीं जाऊँगी.. पीयूष को धोखा नहीं दूँगी.. पर जैसे ही हफ्ता-दस दिन का समय बीतता है.. दिल फिर से फुदकने लगता है.. ऐसा लगने लगता है की मेरे पास सिर्फ मेरा शरीर है.. आत्मा तो पिंटू के कब्जे में है.. उसके बिना मुझे मेरा जीवन ही अधूरा सा लगता है.. आपको पता नहीं है.. ये प्यार मुझे कितना रुलाता है.. क्या आपने कभी किसी से ऐसा प्यार किया है?”

 

बड़ा पर्सनल सवाल पूछ लिया कविता ने और फिर उसके मन में आया की उसे ये सवाल पूछना नहीं चाहिए था..

 

रेणुका: “नहीं.. मैंने कभी किसी से इस तरह प्रेम नहीं किया.. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी.. ये तो पिछले एक साल से अकेलेपन से जुज़ रही थी.. सिर्फ जिस्म की जरूरत नहीं है.. राजेश और मैं काफी बातों पर सहमत नहीं है.. काफी बहस होती रहती है हम दोनों के बीच.. मुझे संगीत, ग़ज़ल और डांस का शोख है तो राजेश पूरा औरंगजेब है.. मुझे अपने साथी के साथ आराम से बैठकर प्यार भरी जज्बाती बातें करना बहोत पसंद है.. लेकिन राजेश खाना खाकर अपना लेपटॉप लेकर बैठ जाता है.. उसकी ऐसी अवहेलना को झेलकर मैं बेडरूम में जाकर सो जाती हूँ.. तो वो साढ़े दस बजे मुझे जगाने आ जाता है.. और कहता है की ‘तुम औरतों को सोने के अलावा ओर कोई काम ही नहीं है.. मेरे साथ सेक्स करने का तुझे मन ही नहीं करता ‘

 

रेणुका लगातार बोलकर अपने दिल की भड़ास निकाल रही थी

 

रेणुका: “ये मर्द लोग भी हमारा दर्द न जाने कब समझेंगे? हमें क्या चाहिए या फिर क्या पसंद है.. किस बात को लेकर तड़प रहे है.. उन्हे तो बस बिस्तर पर पड़ते ही कपड़े उतारने में दिलचस्पी होती है.. पिछले कुछ वक्त से राजेश लगभग सेक्स-मेनीयाक बन गया है.. मेरे साथ जबरदस्ती भी करने लगा है”

 

कविता: “जबरदस्ती??? क्या कोई पति अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती कर सकता है? जरूरत ही क्या है? सेक्स करने के लिए तो पति पत्नी को समाज ने ही तो अनुमति दी हुई है.. दोनों जो चाहे वो कर सकते है इसमे जबरदस्ती की बात कहाँ से आई?”

 

रेणुका: “मेरी बात को अच्छे से समझ.. हमारा मुड़ रोज एक जैसा तो होता नहीं है.. कभी कभी हम शरीर से.. कभी मन से.. कभी सामाजिक जिम्मेदारियों से थके हुए होते है.. कभी किसी बात से डिस्टर्ब भी हो सकते है.. तब सेक्स का मन नहीं करता.. पर अगर मैं मना करू तो राजेश मेरे ऊपर टूट पड़ता है.. मेरे जिस्म पर काटता है.. अरे कभी कभी तो पिरियड्स के दिनों में भी जिद करता है.. और में मना करू तो कहता है की मुंह में लेकर डिस्चार्ज करवा दे.. ये बिजनेस टूर पर विदेशों में घूम घूम कर ज्यादा जिद्दी हो गया है.. वहाँ की फिरंगी वेश्याओं को तो पैसे मिलते है ये सब करने के.. पर राजेश वहाँ से ये सब उल्टा सीधा सीखकर आते है और मुझपर जबरदस्ती करते है.. ” रेणुका जज्बाती हो गई

 

उसका दर्द समझ सकती थी कविता.. रेणुका के दिल में एक अजीब सी खलिश थी.. जो प्यार और दुलार चाहती थी

 

रेणुका ने बात आगे चलाई “अब मैंने भी बहस करना छोड़ ही दिया है.. वो जैसे चाहते है वैसा मैं करती हूँ.. पर ऐसी ज़िंदगी से मैं ऊब चुकी हूँ.. इसलिए मुझे किसी ऐसे साथी की तलाश है जो मुझे समझ सके.. तू किस्मत वाली है.. दिल का दुखड़ा सुनाने के लिए तेरे पास पिंटू जो है.. जो है तेरे पास उससे खुश रहना सीख और उसे संभाल कर रख.. मैं तेरी और पिंटू की मीटिंग का बंदोबस्त करती हूँ.. अब खुश !!”

 

कविता के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई.. और पूरा कमरा उस मुस्कान से झगमगा उठा और एक ही पल में वह फिर से उदास हो गई

 

कविता: “मतलब मैं घूमने जाऊ और वैशाली पीयूष को लाइन मारे यह बर्दाश्त करती रहू.. ?? ”

 

रेणुका: “नहीं.. उसके लिए मैं एक मास्टर प्लान बना रही हूँ.. तू चिंता मत कर.. जिन चार दिन की तू बात कर रही है.. उन चार दिनों में, मैं खुद ही अपनी कंपनी की टूर का आयोजन करूंगी.. हम सब साथ ही जाएंगे.. पिंटू, पीयूष और मैं.. हम सब साथ में ही होंगे.. अगर पीयूष और वैशाली कुछ उल्टा सीधा करे तो तू भी पिंटू के साथ शुरू हो जाना.. कम से कम दोनों तेरी नजर के सामने तो रहेंगे.. !! और शीला के बारे में डरना छोड़ दे.. तू मान रही है उतनी बुरी शीला नहीं है.. मैं उसे अच्छी तरह जानती हूँ.. तुझे पता है.. शीला का तो पहले से ही कहीं और चक्कर चल रहा है?”

 

कविता के मन के समाधान के लिए रेणुका ने एक ही पल में शीला का राज खोल दिया “वो तुम्हारे यहाँ दूध देने आता है उसका क्या नाम है?”

 

“रसिक.. ” कविता ने जवाब दिया

 

“हाँ रसिक.. उसके साथ ही शीला का चक्कर चल रहा है.. अब एक औरत कितने चक्कर चलाएगी? इसलिए तू अपने पति और पिंटू की चिंता छोड़ दे.. अगर शीला उनसे बात करती है.. थोड़ा बहोत फ्लर्ट करती है.. तो उसमें हर्ज ही क्या है? इतना तो चलता है यार.. मॉडर्न ज़माना है.. थोड़ा अपनी सोच को खोलना सीख.. और शीला तेरे प्रेमी को छीन लेगी ये मैं नहीं मानती.. और मान ले अगर ऐसा कर भी लिया तो कितने दिन कर पाएगी? कुछ ही दिनों में उसका पति लौटने वाला है.. एक बार मदन के लौटने के बाद शीला को थोड़े ही ऐसे मौके मिलेंगे?”

 

रेणुका की बातों से कविता की हिम्मत बढ़ गई.. उसे विश्वास हो गया की पिंटू सुरक्षित था। शीला भाभी के पति कुछ ही दिनों में वापिस आने वाले थे उसके बाद तो भाभी कुछ कर ही नहीं पाएगी.. और वैसे भी भाभी ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है.. अपने घर पर मेरे और पिंटू के मिलने का सेटिंग किया था.. उस दिन मूवी थीयेटर में भी पिंटू के साथ मजे करने का जुगाड़ सेट किया था.. मुझे उनका उपकार भूलकर उनपर शक नहीं करना चाहिए..

 

शीला के प्रति जो कड़वाहट कविता के मन में थी वो अब भांप बनकर गायब हो चुकी थी

 

कविता: “ठीक है रेणुकाजी, मैं अब चलती हूँ.. आपने ये कंपनी ट्रिप की बात करके मेरा मन हल्का कर दिया.. अब हम सब साथ में मजे करेंगे”

 

रेणुका: “साथ में कहाँ.. तू तो पिंटू के साथ मजे करेगी.. ” कविता को चिढ़ाते हुए रेणुका ने कहा

 

दोनों हंस पड़े..

 

अब कविता वहाँ से निकल गई और फटाफट ऑटो पकड़कर घर पहुंची.. शीला ने उसे रिक्शा से उतरते हुए देखा पर कुछ पूछा नहीं.. पर उसकी पारखी नजर ने तुरंत भाप लिया.. कविता जरूर कुछ गुल खिलाने गई थी.. ज्यादा से ज्यादा पिंटू के साथ कहीं चुदवाने गई होगी.. और क्या !!! घर पर उसकी बहन है.. और मेरे घर पर वैशाली आई हुई है.. बेचारी और कर भी क्या सकती है.. !! शीला घर के काम में मशरूफ़ हो गई.. काम करते करते उसकी नजर केलेंडर पर पड़ी.. अभी और ८ दिन बचे थे मदन को लौटने में.. मदन की जुदाई में एक एक दिन भारी पड़ रहा था शीला को.. एक ही प्रकार के इस जीवन से अब ऊब चुकी थी शीला.. वैशाली कहीं बाहर गई हुई थी.. अपनी सहेली फोरम के साथ.. आज बड़े दिनों बाद शीला घर पर अकेली थी.. अकेलेपन में सेक्स के विचार दिमाग पर हावी हो जाते थे..

 

शीला के दिमाग में अलग अलग द्रश्य चलचित्र की तरह चलने लगे.. रूखी के दूध से भरे हुए बड़े बड़े स्तन.. जीवा के दमदार धक्के.. रघु के मजबूत हाथ.. उस रात दारू पीकर उन दोनों ने जिस प्रकार उसकी चुदाई की थी.. आहाहाहा.. मज़ा आ गया था.. पिछले एक महीने में कितना कुछ हो गया था.. चेतना और पिंटू के साथ वो रसभरी चुदाई..!! रेणुका और अनुमौसी के साथ हुआ ग्रुप सेक्स.. और सुबह सुबह रसिक के साथ लिए हुए मजे..!! वाह..!!

 

अनजाने में ही शीला के हाथ उसके स्तनों को मसलने लगे.. उसने अपनी जांघें जोड़ ली.. उसका दिमाग रसिक के मूसल लंड को याद करने लगा.. एक बार मौका मिले तो मदन के आने से पहले रसिक और जीवा के साथ एक यादगार प्रोग्राम करने की तीव्र इच्छा हो रही थी.. पर वैशाली की मौजूदगी में यह मुमकिन न था.. शीला को रसिक से भी ज्यादा जीवा के साथ मज़ा आया था.. रूखी का जोबन रसिक की वजह से नहीं.. पर जीवा के धक्के खा खाकर ही खिल उठा था.. रूखी के घर पर भी कुछ हो नहीं सकता था.. क्या करें!!!

 

अपने मुंह में उंगली डालकर गीली करते हुए शीला ने घाघरे के अंदर हाथ डाला और अपनी जामुन जैसी क्लिटोरिस को रगड़ने लगी.. दूसरे हाथ से उसने अपनी निप्पल को पकड़कर खींचा.. और सिसकने लगी.. गरम होकर उसने मुठ्ठी में अपनी चुत पकड़कर मसल दी.. कामुक होकर वह अपने चूतड़ ऊपर नीचे करते हुए कराह रही थी.. पर ऐसा करने से तो उसकी भूख और भड़क गई..

 

वह उठ खड़ी हुई.. और घर में बेबस होकर घूमने लगी.. उसके भोसड़े में जबरदस्त खुजली होने लगी थी.. जो एक दमदार लंड से ही शांत हो सकती थी.. बाहर काफी अंधेरा हो चुका था.. वैशाली का अब तक कोई पता न था.. शीला अपने बरामदे में बने बागीचे में आई और वहाँ रखी कुर्सी पर बैठ गई.. पर उसे कहीं भी चैन नहीं मिल रहा था.. वह खड़ी हो गई.. और बावरी होकर बागीचे में यहाँ वहाँ घूमने लगी.. जांघों के बीच चुत में आग लगी हुई थी.. और उस आग ने शीला को बेकाबू बना दिया था.. कोने में बरगद का पेड़ था.. उसके खुरदरे मोटे तने के साथ शीला अपना जिस्म रगड़ने लगी.. वो उस पेड़ के तने से लिपट गई.. अपने भरे हुए स्तनों को उसने ब्लाउस के दो हुक खोलकर बाहर निकाल दिए.. और फिर से पेड़ को लिपट गई..

 

शीला की हवस अब उफान पर चढ़ी थी.. पेड़ से अपने स्तनों को घिसते हुए शीला को ठंडक और जलन का एहसास हो रहा था.. तने को और जोर से लिपट कर शीला ने एक लंबी सांस छोड़ी.. “ओह मदन.. तू जल्दी आजा.. अब नहीं रहा जाता मुझसे”

 

शीला ने अपना घाघरा उठा लिया.. और घाघरे का कोना कमर में फंसा दिया.. घर पर वो अक्सर पेन्टी नहीं पहनती थी.. उसका नंगा भोसड़ा कामरस से गीला हो चुका था.. अपनी चुत को उसने पेड़ के तने पर घिसना शुरू कर दिया.. सिसकते हुए शीला ने अपने एक पैर को पेड़ के तने के ऊपर चढ़ा दिया जैसे पेड़ की सवारी कर रही हो.. जिससे चुत को पेड़ से ज्यादा नजदीकी मिले.. घिसते हुए एक अजीब सा एहसास हो रहा था उसे.. नीचे हाथ डालकर उसने अपनी चुत के दोनों होंठों को चौड़ा किया.. और पेड़ से चिपका दी अपनी चुत.. ​

अचानक शीला को किसी ने पीछे से पकड़ लिया.. !!! शीला कुछ समझ या बोल पाती उससे पहले उस शख्स ने शीला को पेड़ से दबाकर उसके चूतड़ चौड़े कीये और उसकी गांड में एक उंगली डाल दी.. दर्द के मारे शीला के गले से एक धीमी चीख समग्र वातावरण में फैल कर शांत हो गई.. उस व्यक्ति ने अपना हाथ आगे डालकर शीला की चूत पकड़ ली.. और उसी के साथ शीला का विरोध खतम हो गया..

 

“कौन हो तुम ????” शीला ने धीमे से पूछा.. जो काम करते वो खुद पकड़ी गई थी ऐसी सूरत में चिल्ला कर कोई फायदा नहीं था.. बदनामी उसी की होती.. उस व्यक्ति ने जवाब देने के बदले शीला को घूमकर अपनी ओर किया और उसके होंठ पर अपने होंठ दबा दिए.. शीला के खुले स्तन उसकी मर्दाना छाती से दबकर चपटे हो गए..

 

जरा भी वक्त गँवाए बिना उस शख्स ने शीला को उत्तेजित करना जारी रखा.. शीला डर गई थी.. उसके गले से आवाज ही नहीं निकल पा रही थी.. उस आदमी ने शीला को पूरी ताकत से अपनी बाहों में जकड़ रखा था.. घबराई हुई शीला अभी भी उसकी बाहों से छूटने की भरसक कोशिश कर रही थी..

 

वह आदमी शीला को मस्ती से चूमते हुए उसके स्तनों को मसल रहा था.. शीला के मांसल चूचकों को अपनी उंगली और अंगूठे के बीच दबा रहा था.. स्त्री कितनी भी सीधी क्यों न हो.. उसके स्तन पर मर्द के हाथ फिरते ही वह निःसहाय बन जाती है.. पके हुए पपीतों जैसे शीला के उरोजों को काफी देर तक मसलते रहने के बाद शीला अब विरोध कर पाने की स्थिति में नहीं थी..

 

चारों तरफ घनघोर अंधेरा था.. आज स्ट्रीट लाइट भी बंद थी.. इतना अंधेरा था की खुद की हथेली को भी देख पाना संभव नहीं था.. ऐसी सूरत में.. उस आदमी को शीला चाहकर भी देख नहीं पा रही थी.. जैसे ही शीला का विरोध शांत हुआ उस आदमी ने अगला कदम लिया.. अपने पेंट की चैन फटाफट खोलकर अंदर से निकला गरमागरम कडक लोडा शीला के हाथों में थमा दिया..

 

अब शीला कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं थी.. उसकी पसंदीदा चीज उसके हाथों में आ चुकी थी.. जिसके लिए वह पिछले एक घंटे से तड़प रही थी.. पर उसके मन को एक ही प्रश्न अब भी सता रहा था.. कौन है यह व्यक्ति? रसिक.. ?? पिंटू.. ?? पीयूष.. ?? रघु.. या फिर जीवा.. ?? नहीं नहीं.. इन सब में से कोई नहीं था.. क्योंकि इन सभी के स्पर्श से वह भलीभाँति वाकिफ थी.. यह बिल्कुल नया ही स्पर्श था.. अंधेरे में वह उस शख्स के चेहरे को देखने की कोशिश करती ही रही

 

उस आदमी के मुंह से शराब की गंध आ रही थी.. दिमाग पर पूरा जोर लगाने के बावजूद वह कौन था ये पहचान न पी शीला.. उस आदमी ने शीला को फिर से मोड़कर उल्टा कर दिया और पेड़ के तने पर झुकाकर पीछे से शीला के भोसड़े में अपना लंड एक धक्के में पेल दिया.. शीला के बालों को पकड़कर वह ऐसे धक्के लगाने लगा जैसे लगाम पकड़कर घोड़ी की सवारी कर रहा हो..

शीला इस योनिप्रवेश से इतनी उत्तेजित हो गई की उसने विरोध करना ही छोड़ दिया.. और उस दमदार ठुकाई का आनंद लेने लगी.. जिस तरह से वह शक्ष बाल खींच रहा था उससे शीला को दर्द हो रहा था पर भोसड़े में खिली बहार के आगे इस दर्द का कोई मुकाबला नहीं था.. शीला को अब एक ही बात जाननी थी.. की ये कौन चूतिया है? लेकिन वो शख्स शीला को घूमने ही नहीं दे रहा था.. साले ने दस मिनट तक लगातार धनाधन धक्के लगाकर शीला के भोसड़े की माँ चोद डाली..

 

शीला की चूत से ऑर्गैज़म के रूप में जल-वर्षा होने लगी.. उसकी चिपचिपी चुत में लंड अंदर बाहर होने की वजह से पुच-पुच की आवाज़ें आ रही थी.. शीला की चुत ने कब का पानी छोड़ दिया था पर वह आदमी और १०-१२ धक्के लगाकर अंदर चोट लगाए जा रहा था.. फिर अचानक एक जोर का धक्का लगाकर वह स्थिर हो गया.. शीला के भोसड़े की सिंचाई होने लगी.. लंड के वीर्य की धार बच्चेदानी के द्वार पर गरम लावारस की तरह छूटने लगा..

उस आदमी का आवेश शांत होने पर उसने एक आखिरी जोर का झटका लगाया.. शीला अपना संतुलन खो बैठी और पेड़ के तने से फिसलकर जमीन पर गिर गई.. एक पल के लिए उसे चक्कर सा आ गया.. अपने आप को संभालकर वह खड़ी हुई तब तक तो वो आदमी भाग गया था.. शीला हतप्रभ सी उसी अवस्था में कुछ देर बैठी रही.. फिर उसे अपनी स्थिति का अंदाजा हुआ.. उसका ब्लाउस पेट तक चला गया था.. दोनों बबले बाहर झूल रहे थे.. घाघरा कमर तक चढ़ा हुआ था.. और बगीचे की घास, उसकी वीर्य टपकाती चुत पर गुदगुदी कर रहा था.. ​

शीला तुरंत खड़ी हुई और भागकर घर के अंदर आई.. वैशाली के आने से पहले उसे अपना हुलिया ठीक करना था.. उसने फटाफट एक शावर लिया और कपड़े ठीकठाक कर लिए.. बरामदे की लाइट चालू करके वो मुआयना करने लगी.. कहीं कोई निशानी मिल जाए की कौन था वो मादरचोद जो मेरे ही घर में, मेरा ही बलात्कार करके चला गया?? अब इस घटना की शिकायत भी किससे करें? कौन यकीन करेगा? एक पल के लिए तो शीला को हंसी भी आ गई..

 

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