बहन की चुदाई की यादें (पाप पुण्य) – 2
(Family Sex Stories) 107
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उस जगह अंधेरा होने का वो आदमी अब पूरा फायदा उठा रहा था वैसे भी इतनी सुनदर जवानी से भरपूर लड़की उसकी किस्मत में कहा थी? दीदी न जाने क्यों उसे रोक नहीं रही थी और बीच-बीच में मुझे भी देख रही थी की कहीं मैं तो नहीं देख रहा हूँ? मैंने एक अखबार उठा लिया था और उसको पढ़ने के बहाने कनखियों से दीदी को देख रहा था। जब दीदी को लगा मैंने कुछ नहीं देखा तो वो थोड़ी रिलेक्स लगने लगी।
वो आदमी लगभग 10 मिनट से दीदी के कपड़ों के ऊपर से ही खड़े-खड़े अपना लण्ड अनदर-बाहर कर रहा थातभी मुझे लगा उस आदमी ने दीदी के कान में कुछ बोला, जिसका दीदी ने कुछ जवाब नहीं दिया। फिर उस आदमी ने अपना दीवार की तरफ वाला हाथ उठाकर सीधे दीदी की चूची को साइड दबा हदया और दीदी की आँखें 5 सेकंड के लिए बंद हो गई और उनके दांत उनके रसीले होंठों को काटने लगे।
मुझे ठीक से समझ में नहीं आया पर वो आदमी हवस के नशे में दीदी की चूची को ज्यादा ही जोर से दबा गया था। जब तक दीदी का नंबर आ गया था तो काउंटर पर बैठा आदमी बोला- “मैडम लंच टाइम है…”।
दीदी ने कहा- मैं बहुत देर से लाइन में लगी हूँ।
उसने कहा- “वैसे तो अब काउंटर बंद होने का टाइम है पर 10 मिनट इंतेजार कीजिए, मैं खाना खाकर आता
हूँ…” और वो खिड़की बंद करके चला गया।
अब लाइन में केवल दीदी और वो गंदा आदमी ही बचे थे। तभी उसने दीदी के कान में फिर से कुछ कहा और दीदी ने झिझकते हुए अपनी टांगों को थोड़ा खोल दिया। अब वो थोड़ी तेजी से दीदी के उभरे हुए चूतड़ों को ठोंकने लगा। हवस का ऐसा नजारा देखकर मैं पागल हो गया की दीदी उसको सपोर्ट कर रही थी और उनको इस बात का भी डर नहीं था की अगर बैंक में कोई उनको ऐसे देख लेता तो कितनी बदनामी होती? मैं और देखना चाहता था की वो आदमी अब क्या करेगा?
तभी उसने दीदी से फिर कुछ कहा इस बार दीदी ने भी उसको कुछ जवाब दिया तो वो कुछ पीछे होकर खड़ा हो गया और दीदी ने मुझे आवाज लगाई- “मोनू जरा इधर तो आ…”
मैं उधर गया और अंजान बनकर दीदी से बोला- क्या हुआ दीदी?
“सुन यहा तो खाने का टाइम हो गया है, अगर मैं हटी तो कोई और लाइन में लग जायेगा तो मैं यही लाइन में
हूँ, तू तब तक जाकर 10 स्टैम्प ले आ। पापा ने मंगवाए थे…” और उनहोंने मुझे 20 रूपये दिए- “जा जल्दी से ले आ…”
मुझे गुस्सा तो बहुत आया पर क्या करता? जाना तो पड़ेगा ही। तो मैं पैसे लेकर जल्दी से पोस्ट ऑफिस की तरफ भगा। बाहर जाकर मैंने मुड़कर देखा की वो आदमी फिर दीदी से कुछ कह रहा था। अब दीदी उसकी तरफ देख रही थी और उनका चेहरा अभी भी लाल था। मैं जल्दी से स्टैम्प लेने के लिए दौड़ने लगा और सोचने लगकी अब वो आदमी दीदी के साथ क्या कर रहा होगा?
मेरी दीदी तो बहुत भोली है फिर दीदी ने मुझसे जाने के लिए क्यों कहा? क्या जो हो रहा था उसमें दीदी की मर्जी थी? नहीं नहीं मेरी दीदी ऐसी लड़की नहीं है। वो शायद डर के कारण कुछ नहीं बोली थी। वो आदमी इसी का फायदा उठा रहा था। क्या अब वो रुक जायेगा? क्या दीदी उसको मना करेंगी? मैं येही सब सोच रहा था और स्टैम्प लेकर आने में मुझे 30 मिनट लग गए थे। मैं जल्दी से बैंक पहुंचकर ड्राफ्ट की लाइन की तरफ बढ़ा, पर वहां तो कोई भी नहीं था, और काउंटर बंद हो गया था।
बैंक में भीड़ भी नहीं थी ज्यादातर लोग चले गए थे। तभी मैंने देखा की वो टूटे फर्नीचर वाले रूम से वोही आदमी निकला और मैंने ध्यान से देखा की उसके पैंट की जिप खुली हुई थी। मुझे लगा दीदी शायद घर वापस चली गई होंगी, पर तभी उसी कमरे से दीदी भी अपने बाल ठीक करती हुई निकली। मेरी दिल की धड़कन एकदम से तेज हो गईं। दीदी उस कमरे में उस आदमी के साथ अकेले? जब वो खुले में इतना कुछ कर रहा था तो अकेले में क्या किया होगा? इस सवाल ने मेरे लण्ड में खून का दौरा बढ़ा दिया।
“आप कहां चली गई थी? मैं आपको ढूँढ़ रहा था…” मैंने दीदी से कहा।
दीदी हल्का सा घबरा गई फिर मुस्कुरा कर बोली- तू स्टैम्प ले आया?
“हां ले आया, और अपने ड्राफ्ट बनवा लिया?”
“नहीं यार, वो क्लर्क बोला की आपका अकाउंट यहा होना चाहिए ड्राफ्ट बनाने के लिए…” दीदी बोली। दीदी का कुरता कई जगह से पसीने से तर-बतर था मतलब दीदी उस कमरे में काफी देर रही थी।
दीदी मेरे सामने खड़ी थी। मैंने ध्यान से देखा की उनके सूट पर बहुत झुरिया पड़ी हुई हैं, खास करके उनकी छातियों पर। पर जब हम घर से चले थे तो दीदी ने प्रेस किया हुआ कुरता पहना था। मैंने दीदी से सीधे पूछ लिया- “आप उस कमरे में क्या कर रही थी?”
दीदी मुमकुराकर बोली- “अरे उधर वॉशरूम है न…”
पर मुझे लगता था ये काम उस गंदे आदमी के हाथों का है। मुझे अब बहुत जलन सी हो रही थी उस गंदे आदमी से और ऊपर से दीदी मुझसे झूठ बोल रही थी। मुझे लगा वो मेरे जाते ही काउंटर से हटकर उस टूटे फनीचर वाले अंधेरे कमरे में चली गई थी, तभी ड्राफ्ट नहीं बना।
मेरा ये सब सोचकर बुरा हाल था मेरा लण्ड भी बहुत अकड़ रहा था और मुझे बाथरूम जाना था। मैंने सोचा की मैं भी वॉशरूम जाने को बोलता हूँ तो ये पता चल जायेगा की दीदी सच बोल रही है या नहीं? तो मैंने दीदी को रुकने को बोला और उस कमरे में चला गया। उस कमरे के एक कोने में लेडीज और दूसरे कोने में जेंट्स वॉशरूम थे मतलब दीदी सच बोल रही थी और वो आदमी भी हो सकता है की बाथरूम से निकलकर आ रहा था जब मैंने उसे देखा। मैंने जल्दी से बाथरूम जाकर पेशाब की और बाहर आकर देखा की दीदी अभी भी अपना सूट ठीक कर रही थी।
मैं अब ध्यान से कमरे को देखने लगा। टूटा पुराना फनीचर सीलन से भरा हुआ कमरा था, ऊपर रोशनदान से
हल्की रोशनी आ रही थी, फर्श पर धूल की मोटी परत जमी थी, जिन पर लोगों के पैरों के निशान बने थे। तब मैंने देखा की सब निशान तो बाथरूम की तरफ जा रहे हैं पर सिर्फ़ चार पैरों के निशान कमरे के दूसरे कोने की तरफ जा रहे थे, जहा कुछ टेबल्स एक के ऊपर एक रखी थी और उनके पीछे जाकर वो पैरों के निशान आपस में ऐसे मिल रहे थे जैसे काफी खींचतान हुई हो। मैंने सोचा क्या ये दीदी और उस आदमी के निशान हैं? फिर मैं जल्दी से रूम से निकल आया।
फिर हम घर की तरफ चल पड़े। मैं यही सब सोच रहा था तो दीदी से थोड़ा पीछे हो गया। मैंने देखा की उनकी चोटी से भी काफी बाल बाहर आ गए थे और उनकी गर्दन पर एक निशान भी था, जैसे किसी ने काटा हो।ऋषि के साथ वो सब गंदी फिल्में देखने से मेरे मन में गंदे ख्याल आने लगे की पक्का दीदी और उस आदमी के बीच कुछ हुआ है? पर खड़े-खड़े 15-20 मिनट में चुदाई तो नहीं हो सकती।
हमारे घर पहुूँचने तक हममे कोई बात नहीं हुई। रात को भी मुझे नींद नहीं आ रही थी और रह-रहकर बैंक की बातें मेरे दिमाग में घूम रही थीं, और सबसे ज्यादा ये की दीदी ने उस आदमी को रोका क्यों नहीं? ये सब सोचते-सोचते मैंने सामने सोती हुई दीदी को देखा और मेरा हाथ अपने खड़े हुए लण्ड पर चला गया। और मैं जोर-जोर से अपना लण्ड हिलाने लगा, और थोड़ी देर बाद मेरा पानी निकल गया और मैं फिर सो गया।
अगले दिन शाम को मैं ऋषि से कैफे में मिल और फिर से कुछ ब्लू – फिल्म देखी और वहां से निकलकर मैं साथ के सरकारी टायलेट में घुस गया और पेशाब करने लगा।
तभी ऋषि भी अंदर घुस आया और बोला- “क्यों बे मुठ मार रहा है क्या?” और हूँसते हुए मेरे बगल में खड़ा
होकर मूतने लगा- “आह आहै आह्ह… यलगार…” वो अपना मुूँह ऊपर करके बोला।
तभी मेरी नजर उसके लण्ड पर गई। बाप रे… कितना बड़ा लण्ड था उसका? मैं उसका साइज अपने से कम्पेयर करने लगा। हम दोनों के ही लण्ड खड़े थे अगर मेरा लण्ड 4½” इंच का था तो उसका कम से कम 7½” इंच का रहा होगा और मोटा भी ज्यादा था। मुझे लगा इसका बैठा हुआ लण्ड मेरे खड़े लण्ड के बराबर होगा। फिर मैंने
सोचा की इसकी उम्र भी मुझसे ज्यादा है शायद इसीलिए।
तभी ऋषि ने देखा की मैं उसके लण्ड को घूर रहा हूँ- “क्यों कैसा लगा गांडु?” वो मुझे छेड़ते हुए बोला- “मुूँह में लेगा क्या?”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया और अपनी जिप बंद करके बाहर आ गया।
“अबे बोल न बड़ा है न? साले इसी पर तो लड़कियां मरती हैं…” वो भी बाहर आते हुआ बोला- इंडिया में कामन
साइज 5-6 इंच का होता है। मेरा स्पेशल साइज है समझा?” और हम घर की तरफ बढ़ गए।
हम थोड़ी दूर ही गए थे तभी मुझे लगा की कोई मुझे बुला रहा है। मैंने पीछे देखा की रश्मि दीदी मेरे तरफ आ रही थी। उनहोंने आज आसमानी रंग की जीनस और पैरेट कलर का टाप पहना हुआ था। हालांकी हमारे शहर में उस वक़्त लड़कियां जीनस बहुत कम पहनती थी, पर हमारे घर पर ऐसी कोई रोक टोक नहीं थी।
“क्या बात है साले त तो छुपा रुस्तम निकला? पूरे शहर में नहीं मिलेगा ऐसा माल फसाया है बे…” ऋषि दीदी को
घूरते हुए बोला।
मुझे बड़ा गुस्सा आया ऋषि पर। मैंने चिढ़ते हुए बोला- “वो मेरी बड़ी बहन है। फालतू बात मत करो…”
तब तक दीदी हमारे पास आ चुकी थी। उनके बदन से डी॰ओ॰ की भीनी-भीनी खुिब आ रही थी, कहा- “कहां घूम रहा है और ये श्रीमान कौन हैं?” दीदी ऋषि की तरफ देखते हुए बोली।
मेरे कुछ कहने से पहले ही ऋषि ने आगे होकर अपने हाथ बढ़ा दिया- “जी मेरा नाम ऋषि है, मैं इसका दोस्त हूँ हम साथ ही पढ़ते हैं…”
दीदी ने भी अपना हाथ आगे करके ऋषि से हाथ मिलाया।
तब मैंने कहा- “ये किरण आंटी का बेटा है…”
दीदी- “ओके, वेरी नाइस टु मीट यू , ऋषि , तुमको तो कभी देखा ही नहीं। कभी अपनी मम्मी के साथ घर आओ न…”
मैंने देखा ऋषि की नजरें सिर्फ दीदी की चूचियों पर गड़ी थी। टॉप दीदी के बदन पर एकदम फिट था और उसमें दीदी की गोलाईया बहुत आकर्षक लग रही थी। दीदी ने भी ऋषि को अपने बदन का मुआएना करते हुए देख लिया और वो थोड़ा शर्मा गई।
“दीदी मैं तो घर ही जा रहा था। बस यहा ऋषि से मिलने आया था…” मैं बोला।
“अच्छा जल्दी से घर आ जाना। मुझे तुझसे कुछ काम है…” दीदी बोली।
“आप फिक्र मत करिए, मैं खुद इसको घर छोड़ दूंगा…” ऋषि दीदी की आँखों में झांकता हुआ बोला और फिर से हाथ आगे बढ़ा दिया।
“थैंक यू ऋषि …” दीदी ने उससे हाथ मिलाते हुए कहा।
“और हा दीदी, अगर आपको मुझसे कोई काम हो तो जरूर बताइयेगा…” ये कहते हुए ऋषि ने दीदी का हाथ हल्के
से दबा दिया।
दीदी ने अपना हाथ छुड़ाया और जाने लगी। पीछे से ऋषि उनके सुडोल और उभरे हुए चूतड़ों को देख रहा था और अपना लण्ड खुजा रहा था। ये देखकर मेरे मन में एक कसक सी उठी, न जाने क्यों?
फिर हम थोड़ी देर इधर – उधर की बातें करते रहे और ऋषि कहने लगा- “चल तुझे घर छोड़ आता हूँ…”
मैंने मना किया तो वो पीछे लग गया। बोला- “मैंने दीदी से प्रोमिस किया है…”
दरअसल मैं जानता था की ऋषि एक बिगड़ा हुआ आवारा लड़का है, और मैं उसे अपना घर नहीं दिखाना चाहता था। पर वो मुझे घर तक छोड़ ही गया। वो तो अनदर भी आना चाहता था, पर मैंने उसे बहाने से टरका दिया।
मैं घर में घुसा तो पापा ने कहा- “अरे तुझे रश्मि पूछ रही थी। पता नहीं क्या काम है? ऊपर रूम में गई है जा देख…”
मैंने ऊपर जाकर देखा तो दीदी बेड पर लेटी थी। मुझे देखते हीबोली- “आ गया तू । वो काम तो अभी रहने दे
पहले मेरा सिर बहुत दर्द कर रहा है जरा तेल लाकर मालिश कर दे…” और वो उठकर नीचे फर्स पर बैठ गई।
मैं तेल लाकर बेड के ऊपर बैठ गया। दीदी मेरे दोनों पैरों के बीच में आ गई। दीदी ने एक पुरानी टी-शर्ट और
लोअर पहना हुआ था। मैंने अपने हाथों में तेल लिया और उनके रेशमी बालों में हाथ डाल दिए और हल्की-हल्की
मालिश करने लगा। तभी मेरा ध्यान दीदी के टी-शर्ट के अगले हिस्से पर गया, जिससे मुझे दीदी की चूचियां साफ दिख रही थीं। दीदी ने ब्रा नहीं पहना था। पहली बार मैंने इतने करीब से दीदी की चूचियों को देखा था।
जैसे-जैसे चम्पी करते-करते दीदी का सिर हिलाता था, वैसे-वैसे ही उनकी चूचियां भी हिलती थीं। इस सबसे मेरा
लण्ड फिर से खड़ा हो गया और दीदी के सिर से छूने लगा। इसी उत्तेजना में मैंने दीदी का सिर थोड़ा जोर से रगड़ दिया।
“आह्ह… आराम से भैया…” दीदी बोली।
मुझ पर तो मानो नशा हो गया, मुझे याद आने लगा ऋषि दीदी को कैसे देख रहा था। मुझे वो बैंक वाला आदमी भी याद आ गया। मुझ पर वासना छाने लगी और मैंने दीदी के बालों को उठाकर अपने लण्ड पर डाल लिया और एक हाथ से उनके बालों को अपने लण्ड से रगड़ने लगा और दूसरे हाथ से उनका सिर सहलाता रहा।
“अरे दोनों हाथों से कर न…” दीदी अपनी बंद आंखों को खोलते हुए बोली।
फिर मैंने उनके सिर को थोड़ा पीछे करके अपने लण्ड पर भी लगाया और मैं झड़ने ही वाला था की मम्मी रूम में आ गई।
“क्या बात है बड़ी सेवा कर रहा है बहन की?” मम्मी बोली।
मेरा सारा मजा किरकिरा हो गया।
“सच में माँ ये बहुत अच्छी मालिश कर रहा है…” दीदी हंसते हुए बोली।
“चलो दोनों जल्दी से नीचे आ जाओ खाना लग गया है…” मम्मी बोली।
दीदी ने जुड़ा बाँध लिया और उठ गई। मैंने अपने पर कंट्रोल किया और दीदी के साथ नीचे चला गया। पिछले कुछ दिनों से मेरा दीदी के लिए बदलता नजरिया मुझे बहुत परेशान कर रहा था। अब वो मुझे अपनी बहन नहीं, एक जवान लड़की लगने लगी थी। यह सब बातें मेरी बेचैनी को बढ़ा रही थी। मुझे लगता था, ये पाप है। पर मैं
ये भी सोचता था की अगर दीदी के साथ कोई और ऐसा करे, जिसका दीदी से सिर्फ लण्ड योनि का नाता हो।
मुझे वो बैंक वाला गनदा आदमी याद आ जाता था। ऋषि का दीदी को हवस से घूरना याद आ जाता था।
मेरी तो छुट्टियां चल रही थी पर दीदी के पेपर होने वाले थे तो वो पूरा दिन अपने रूम में बैठकर पढ़ती रहती थी।
एक दिन मैं घर का कुछ सामान लेने घर के सामने वाली दुकान पर गया था। लौटते हुए मैंने देखा की एक आदमी मेरे घर की दीवार पर पेशाब कर रहा है। इसको मैंने एक-दो दिन पहले भी यहा पेशाब करते देखा था।
मैंने सोचा जल्दी से ऊपर जाकर इसके ऊपर पानी फेंक देता हूँ। तभी मैंने देखा वो बार-बार ऊपर देख रहा है।
मेरी नजर ऊपर गई और मैंने देखा की दीदी अपने रूम की खिड़की में से देख रही है।
मैं जब ऊपर गया तो दीदी अपने रूम में नहीं थी और वो आदमी भी जा चुका था। मुझे लगा क्या ये आदमी रोज यहा आता है, और दीदी इसको खिड़की से देखती है?
अगले दिन मैं उसी टाइम पर धीरे से दीदी के रूम में गया और दरवाजे की ओट से मैंने देखा की दीदी खिड़की के पास खड़ी थी और टी-शर्ट के ऊपर से अपनी एक चूची को दबा रही थी और उनके दूसरे हाथ में जो पेन था उसे वो अपनी योनि के पास गोल-गोल घुमा रही थी और लगातार खिड़की से नीचे देख रही थी।
उनका चेहरा वासना से लाल हो गया था। फिर दीदी थोड़ा आगे की तरफ हुई और उनहोंने अपना निचला हिस्सा दीवार से रगड़ना शुरू कर दिया। ये सब देखकर मैंने भी अपना लण्ड बाहर निकल लिया और मैं भी मुठ मारने
लगा। चूंकि घर पर कोई और नहीं था तो मुझे पकड़े जाने का डर नहीं था। दीदी भी जल्दी-जल्दी अपना निचला हिस्सा दीवार से रगड़ने लगी और अपनी कड़क हो चुकी चूचियों को जोर-जोर से दबाने लगी।
“आह्ह… आह इस्स…” दीदी की हल्की सी आवाज मेरे कानों में आई और मेरे लण्ड ने पानी निकाल दिया। शायद दीदी भी झड़ गई थी और वो आकर बेड पर लेट गई और मैं जल्दी से घर से बाहर आ गया। मैंने देखा की वो आदमी पेशाब करके जा रहा था। ये सिलसिला कुछ दिन तक चला फिर उस आदमी ने वहा आना बंद कर दिया।
अब मेरा मन कहीं नहीं लगता था। दिमाग में सिर्फ सेक्स ही घूमता रहता था। मैं चाहे जितनी भी कोशिश करता दिमाग इन सबसे हटाने के लिए पर कही न कहीं से घूमकर बात वहीं आ जाती थी और इसका एक बड़ा कारण ऋषि भी था। उसी ने मेरे अनदर हवस का शैतान जगाया था।
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